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मन से बड़ा न कोय

  • Vinai Srivastava
  • Mar 26, 2022
  • 4 min read

ईश्वर की शक्ति की परिकल्पना तो मन ही करता है। मन के भाव ही हैं जो आपको कुछ भी करने य न करने को प्रेरित करते है। यदि आपका मन कहता हैं कि ईश्वर नहीं है तो आपके लिए ईश्वर नहीं है। यदि आपका मन कहता है कि यह जगत जो चारों ओर नेत्रों से लक्षित,कानों से श्रवणित, स्वाद, गंध,य स्पर्श द्वारा अनुभूत है - मिथ्या है तो मन ,भाव व विचार के किसी अन्य धरातल पर ले जा सकता है। यदि आपका मन कहता है कि यह जगत जो चारों ओर नेत्रों से लक्षित,कानों से श्रवणित, स्वाद, गंध,य स्पर्श द्वारा अनुभूत है - किसी सत्ता द्वारा रचित है, संचालित है, परन्तु पल पल परिवर्तनीय य पल पल पुराना समाप्त होकर नया हो रहा है। फ़ौरन आपका मन ब्रह्मा (रचयिता),विष्णु(संचालक), और शिव (संहारक - परिवर्तक प्रति पल) की संरचना /परिकल्पना कर लेता है।यदि मन कहता है कि इन तीनों क्रियाओं को पृथक करना संभव नहीं है क्यों कि एक वस्तु समाप्त होती है य बदलती है तो नए का निर्माण होता है। कितने कम काल मे य अधिक काल (समय) मे होता है बदलाव सृष्टि के संचालक पर निर्भर है। अतएव ब्रह्मा विष्णु महेश किसी भी पल एक दूसरे से पृथक नहीं है। इनकी सम्मिलित शक्ति को परमात्मा य प्रत्येक को परमात्मा कह सकते हैं। यदि इन तीनों का कार्य़क्षेत्र मन पृथक पृथक मानता है, तो भी इन तीनों के ऊपर की एक सत्ता परमात्मा य परमब्रह्म मानताहै।

मन यदि ऐसे ईश्वर द्वारा रचित और जीवन में उपस्थित किसी भाव पर केन्द्रित होता है तो अन्यान्य भाव ( प्रेम, भक्ति,ममता, वात्सल्य, करुणा , क्रोध, घृणा, मोह,लालच, इत्यादि) उसे विचारों के महासागर मे ले जाते है जिनके प्रभाव मे वह (मन) व्यक्ति से कर्म कराता है और संसार को कर्मक्षेत्र य भाव सागर (अपभ्रंश ‘भवसागर’) मानता है। इस पूरे जीवन को व्यतीत करना इस भव सागर से पार उतरना बोलता है।

इन्हीं भावो के वशीभूत यदि मन किसी दूसरे प्राणी के प्रति कुछअच्छा कराता है जिससे उसका उत्थान हो जीवन यापन के स्तर मे/मनोदशा मे सुधार हो तो करूणा (compassion) का जन्म होता है। इसमें देने का भाव ही होता है कुछ पाने का भाव नहीं होता है।यह ईश्वरीय भाव है। ममता, वात्सल्य भी इसी का रूप है। देने का भाव रखने वाला ही देवी य देवता है ,विशेषकर उसके लिए जो उसके करूणा को प्राप्त करता है। करूणा प्राप्त करने वाले का मन यदि ऐसे देवता य देवी (मानव रूप य एक साकार शक्ति के रूप) पर विश्वास कर उसकी उपासना करना शुरू करे, किसीकृपा विशेष को पाने (कामना) हेतु ,तो भक्ति भाव का उद्भव होता है। किसी मन को यदि वीरता श्रेयस्कर है तो वह किसी वीर की आराधना मे संलग्न हो जाता है। धन श्रेयस्कर है तो धन की शक्ति लक्ष्मी कीआराधना करने लगता है;कोई विद्या श्रेयस्कर है तो सरस्वती की आराधना करता है ।आदि आदि।अत: यह मन ही है जो अनेक भगवान ,देवी, देवता की सृजना करता है। यह सब ,कुछ न कुछ , मन के ‘पाने’ के भाव पर निर्भर है। इस भाव जगत में रहने वाला मन अनेकानेक देवी देवताओं की परिकल्पना कर लेता है जैसे कुल देवता, ब्रह्मा,विष्णु,महेश, दुर्गा , हनुमान , काली,अग्नि, जल , धरती,वायु, इत्यादि। अनेक शक्तियों का मानव रूप मे जन्म लेना और विलक्षण शक्तियों को अपने जीवन मे उतारना,जब किसी के द्वारा हो सका तो ऐसे लोग परमात्मा के अवतार ( राम य कृष्ण) होकर पूज्यनीय और वन्दनीय होकर मन के आराध्य देव हो जाते है। मन उनके प्रत्येक कर्म,आचरण को आदर्श मान कर जीवन मे , समाज मे उतारने की चेष्टा करना अभीष्ट मानताहै।

जीव के जन्म के साथ मन संलग्न होकर तन के साथही साथ इस दुनिया मे अवतरित होता है। मन का जब अपने परिवेश (Environment) से सामना (Interaction) होता है तो बुद्धि ,जिसे प्रारम्भ मे संस्कार तदुपरांत ज्ञान कहें ,विकसितहोती है। जीवन यात्रा का प्रारम्भ बुद्धि के इस नींव के साथ शुरू होता है। साथ ही जागृत होता है इच्छा और अहंकार जब मन दूसरो से स्वयं की तुलना करता है।आगे चलकर बुद्धि का एक परिष्कृत रूप 'विवेक 'उत्पन्न होता है जो बताताहै कि क्या उचित है और क्या अनुचित है।

हिन्दू धर्म में आध्यात्मिक जीवन यात्रा मे मन का विशेष महत्व है। सांसारिक वस्तु य सुख की ओर यदि मन भागता है तो वह भ्रमित होता है ।उसे वास्तविक सुख नहीं मिलताहै वरन वह एक क्षणिक सुख होता है मन किसी और सुख की तलाश में लग जाता है। मन जब शाश्वत आनन्द की तलाश मे लगता है तभी उसकी आध्यात्मिक यात्रा की शुरूवात होती है। फिर शुरू होती है शुद्धि की प्रक्रिया। इसमें सन्निहित है-

  1. तन व मन की शुद्धि(इसे पतंजलि ऋषि ने यम , नियम आसन प्राणायाम के माध्यम से बताया है)

  2. मन की शुद्धि के साथ विचारों की शुद्धि और विचारों की शून्यता ( इसे पतंजलि ऋषि ने प्रत्याहार, ध्यान,धारणा और समाधि के माध्यम से बताया है)।समाधि एक शारीरिक मृत्यु की अवस्था न होकर मन के परे क्षेत्र मे प्रवेश की अवस्था है।जो एक तुरीय अवस्था है और ब्रह्म साक्षात्कार की अवस्था है। इस अवस्था को प्राप्त व्यक्ति ब्रह्मार्षि कहाता है उपनिषदों के अनुसार। अत: मन ही वह शक्ति है जो इन्सान को संसारिक क्षणिक सुख केलिए पूरा जीवन भ्रमित कर सकती है और परमब्रह्म से साक्षात्कार करा सकती है। किसी कवि ने काव्य की कुछ पंक्तियों मन का सटीक चित्रण किया है- मन ही देवता मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोय। मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय।

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