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सभी अंग प्रत्यंग में सर्वश्रेष्ठ कौन?

  • Writer: vinai srivastava
    vinai srivastava
  • Mar 17, 2023
  • 3 min read

एक बहुत बड़ी सभा का आयोजन चल रहा था। शरीर के सारे दिखाई देने वाले और न दिखाई देने वाले छोटे बड़े अंग भाग ले रहे थे। विषय था ‘सर्वश्रेष्ठ अंग कौन है’

सर्वप्रथम बड़बोले मुख ने चर्चा प्रारंभ की,’’मेरे सहोदर बन्धुओं। देखो मैं जब खाता हूँ य पीता हूँ तो वह खाना मै स्वयं के लिए नहीं खाता हूँ वरन् तुम सब के लिए पहुँचे इसलिए मैं उसे आगे प्रेषित कर देता हूँ। यदि मैं स्वयं ग्रहण करना बन्द कर दूँ तो तुम सबका जीवन ख़तरे में पड़ जायेगा। मैं हूँ इसलिए तुमसब जीवित इस सभा मे उपस्थित हो। अतएव सर्व श्रेष्ठ तो मैं ही हूँ।

मोटा पेट हा, हा करके थुलथुला कर हंस पड़ा,” यदि मुँह का खाया पिया मैं दिन रात बिना विश्राम किए न पचांऊ और रक्त न बनाऊँ तो शरीर के किसी भाग को रक्त न मिलेगा। सभी निर्बल और निर्जीव हो जाओगे। अत: सर्वश्रेष्ठ तो भइया मैं ही हूँ।”

हाथ हवा में लहराते हुए बोला,” अच्छा! अगर मैं मुँह में खाना पानी न डालूँ तो यह दोनों मुख और पेट क्या खाएँगे क्या पचाएंगे? जब पूरे शरीर की रक्षा करनी हो तो मैं ही आगे बढ़ता हूँ। कहीं किसी अंग को चोट लगे तकलीफ़ हो तो मै ही उसे सहलाता हूं। सारे शरीर का पोषण करने वाला, रखवाला मैं ही हूं। इसलिए सर्वश्रेष्ठ तो भइया मैं ही हूँ।”

पैर बिचारा नीचे से चीख़ा ,”एक तो मैं ज़िन्दगी भर क्विन्टल तक का बोझा तुम सबका ढ़ोता रहता हूँ मेरी कब सुनते हो। बोझ पर बोझ बढ़ाए चले जाते हो। जब मूल्याँकन की बात आई। तब मै क्या किनारे कर दिया जा रहा हूं।अरे! मैं ही सब को ढो कर वहाँ ले जाता हूँ जहाँ खाना मिले ,सुरक्षा मिले सभी को। यदि यह सब सत्य है तो सर्व श्रेष्ठ तो मैं हूँ। “

आंतरिक अंगो की बारी आते ही दिल ,दिल दहलाने वाले अंदाज मे दहाड़ा ,” देखो भइया। बिना एक पल की छुट्टी लिए जन्म से मृत्यु तक ख़ून की डिलीवरी सभी अंगो को करता रहता हूँ। एक क्षण के लिए रूक जाऊँ तो तुम सब में कोई बोलने के क़ाबिल न बचेगा, सबका टाटा , बाई बाई हो जायेगा। अत: मै हूं सर्वश्रेष्ठ।”

दो दो फ़ेफड़े एक साथ बोल पड़े,”दिल की मत सुनिये यह बहुत दु:ख देता है। किसी के बोलने की औक़ात नही है। यदिमैं श्वास लेना बन्द कर दूँ तो? मैं भी बिना विश्राम किए शरीर को ज़िन्दा रखने का काम करता हूँ। मेरे काम करने पर ही दुनिया जान पाती है तुम सब जीवित हो य नहीं।”

सभी लक्षित अंग अपनी अपनी हाँक रहे थे कि उनके बिना शरीर का चलना असंभव है अतएव वे सर्वश्रेष्ठ हैं। जब बारी अलक्षित अंगो की आई तो अलक्षित मन बड़ी गंभीर वाणी में बोला,”हे शरीर के सारे अंगो। क्या तुम जानते हो तुम्हारे शरीर का मस्तिष्क मेरा यंत्र है जिसे तुम सारी सूचनाएँ भेजते हो। मैं ही उसे समझ बूझ कर निर्देश देता हूँ तो तुम सब काम कर पाते हो अपना कर्तव्य निभा पाते हो। मै ही पैर में कष्ट होता है तो पैर को सहलाने की आज्ञा देता हूँ। मै ही नेत्रों को खोलने य बन्द करने, कानों को सुनने य नासिका को सूँघने की आज्ञा देता हूँ। सारे विचारों पर भी मेरा ही नियंत्रण है। मेरे बग़ैर तुमसब कुछ नहीं कर सकते। अत: सर्वश्रेष्ठ मैं हूँ।”

एक कोने में बिचारा प्राण बैठा था। उसने कहा,” बहुत देर से मैं तुमसब की बकबक सुन रहा हूँ। सर्वश्रेष्ठ का फ़ैसला तुम सब लड़ झगड़ तय कर लो। मैं तो चला। “

प्राण के इतना कहते हीसारी सभा में सन्नाटा छा गया। प्राण जैसे ही चलने को उद्धत हुआ, सारे अंग बेजान पड़ने लगे, मस्तिष्क सुन्न पड़ने लगा। मन, मस्तिष्क और सभी अंग मिलकर प्राण की अभ्यर्थना करने लगे,” हे प्राण! तुम ही हम सबसे श्रेष्ठ हो। तुम्ही हम सब में समाए हुए हो। तुम हो तो हम अपना कर्तव्य करने में स़क्षम हैं। तुम ही सम्पूर्ण जगत में समाए हुए हो। तुम हो तो मन है और मन का ज्ञान, बुद्धि विवेक है। तुम सूर्य हो इस सृष्टि के। तुम ही पंच तत्वों में ,कण कण में विद्यमान हो। हम सब तुम्हारी प्रार्थना करते है क्योंकि तुम्हीं इस सृष्टि की आदि शक्ति हो। तुम्हारी जय हो।”

प्राण की अभ्यर्थना के बाद सभा समाप्त हुई।

[प्रस्तुत रचना प्रश्नोपनिषद् में वर्णित ब्रह्मर्षि पिप्पलाद और ऋषि भार्गव के प्रश्नोत्तर पर आधारित है। ]


—विनय


 
 
 

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