मर्ज़ी य मजबूरी
- vinai srivastava
- Mar 13, 2023
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दो दोस्त अजय और विजय उपरोक्त विषय पर भिड़ गए।
अजय कह रहा था,’ ज़िन्दगी में मर्ज़ी चलती है। अगर मर्ज़ी सही दिशा में है तो खुशी देगी नही तो ग़म देगी; दर्द देगी’।
विजय कह रहा था,’मजबूरी ही ज़िन्दगी को दिशा देती है; मर्ज़ी नहीं।’
विजय पुन: तर्क देता हुआ बोला,’ मजबूरी को ही ज़िन्दगी का स्टार्टर मानना पड़ेगा दोस्त। बताओ कोई बच्चा अपनी मर्ज़ी से माँ के पेट से बाहर निकलता है? नौ महिने के बाद मजबूरी में बाहर निकलना पड़ता है वह भी रोते रोते। हुई न ज़िन्दगी की शुरूवात मजबूरी से। अब आगे सोच कि बच्चा माँ की किस मजबूरी व इच्छा से, किस परिवार, किस समाज,य माहौल में मजबूरीवश संसार में प्रकट हुआ है। क्या परिवार, समाज,य माहौल उसकी मर्ज़ी का है? मजबूरी है दोस्त शुद्ध मजबूरी। शायद ही कुछ मर्ज़ी का हो नहीं तो मजबूरी में ही ज़िन्दगी कटती है और फिर मौत भी आ जाती है बिना मर्जी़ के। कौन मरना चाहेगा अपनी मर्ज़ी से।’
अजय मुस्कराया। बोला,’माना कि जन्म पाने और मौत के आने में मर्ज़ी नहीं चलती। ज़िन्दगी तो वह है जो जन्म के बाद और मौत से पहले चलती है। मैं इसी जन्म और मृत्यु के अंतराल यानी ज़िन्दगी की बात कह रहा हूँ जहाँ खुशी व ग़म मिलता है। यहाँ मर्ज़ी ही खुशी दिलाती है और मर्ज़ी ही दु:ख का कारण बनता है। यहीं पर एक सही गुरू की ज़रूरत पड़ती है जो तुम्हारी ज़िन्दगी की गाड़ी सही मर्ज़ी की पटरी पर रख दे। दिशा और गति पर तो तुम्हारी मर्ज़ी ही चलेगी।’
विजय बोला,’वाह। अब मर्ज़ी के साथ गुरू भी आ गए। अरे! अगर गुरू के हिसाब से चलना है, तो मर्ज़ी कहाँ है? भोले दोस्त।’
अजय ने तर्क दिया,’तुम खेल के मैदान में जाते हो तो वहाँ के नियम क़ानून को तो जानना पड़ेगा ही। जो नियम क़ानून बताए वही गुरू है। नियम क़ानून के दायरे में अपने शक्ति व मर्ज़ी के हिसाब से तुम खेल खेलते हो जीतते भी हो, हारते भी हो। जीते तो खुशी हारे तो ग़म। फिर अपनी शक्ति और मर्ज़ी का संयोजन करो फिर जीतो य फिर हारो। यही है ज़िन्दगी। यह जिन्दगी कुछ नहीं बस परिवार , समाज के खेल के मैदान में खेलना ही है। नियम क़ानून पता होना चाहिए फिर चलाओ अपनी मर्ज़ी। मौत आई और खेल ख़त्म।’
विजय अब क्या बोले, कोई परामर्श दे सकता है?
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