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प्रेम

  • Writer: vinai srivastava
    vinai srivastava
  • Mar 17, 2023
  • 1 min read

प्रेम जीवन का वह मूल भाव है जिससे जीवन प्रारंभ होता है। प्रेम जीवन भर साथ रहता है। बस उसे हम विभिन्न रूपों में जानते है। कभी वही प्रेमवस्तुओं के प्रति होकर एक सीमा के बाद लोभ का रूप धारण करता है। कभी यह प्रेम स्वाद में लिप्त होकर चटोरता में बदलता है। कभी यह ध्वनि विशेष से होकर संगीत प्रेम में उभर कर आता है। कभी यही प्रेमइच्छानुसार न होने पर क्रोध बन जाता है। कभी यही प्रेम व्यक्ति य व्यक्तियों के बीच होकर मित्रता मुहब्बत इश्क में परिणत होता है। एक शायर जिगर मुरादाबादी ने इसे यूँ लिखा है कि-

‘ इक लफ़्ज़े मुहब्बत का,

इतना सा फसाना है।

सिमटे तो दिले आशिक,

फैले तो ज़माना है।।’

जब यह प्रेम नश्वर शरीर के साथ जुड़ता है तो काम य वासना का रूप लेता है। यदि यही प्रेम अपने ईष्ट य आराध्य देव के साथ जुड़ता है तो भक्ति का रूप लेता है। यदि यही प्रेम आत्मा का आत्मा से जुड़ता है तो आत्मीयता बन जाता है बीच में शरीर व संसार गौण हो जाते है। प्रेम सारे संसार मे ठीक वैसे ही समाया है जैसे ईश्वर कण कण में समाया है। तभी प्रेम को ईश्वर का प्रतिरूप कहा गया है। Love is God. आज हम सब को इस आत्मीयता की आवश्यकता है प्रिय आत्मजन।

 
 
 

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