प्राण क्या है- क्या यह एक स्पन्दन है!
- rrichaasrivastava
- Jun 19, 2022
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इस रचना मे आईए हम सब विचार करे कि प्राण आख़िर है क्या। हम अपनी इन्द्रियों नेत्र, नासिका, कान , जिह्वा, स्पर्श द्वारा ही संसार को जानते व समझते हैं। यह सभी एक विशेष स्पन्दन को अनुभव करने के शारीरिक यंत्र है। यदि स्पन्दन प्रकाश है,गति है, तो उसको अनुभव करने के लिए नेत्र है। यदि स्पन्दन ध्वनि है तो उसको अनुभवकरने के लिए कान है। यदि स्पन्दन गंध है तो उसको अनुभव करने के लिए नासिका है। इसी प्रकार स्वाद और स्पर्श की तरंगों को अनुभव करने के लिए जिह्वा और शरीर का बाह्य आवरण त्वचा है।
हम किसी प्राणयुक्त य निष्प्राण का निर्णय कैसे करते है? अच्छा यदि कोख मे भ्रूण पल रहा हो तो यदि उसमें स्पन्दन होता है तो हम पाते है कि एक छोटा बिन्दुवत कोशिका आकार प्रकार और गति मे उत्तरोत्तर प्रगति कर पूर्ण मानवाकार धारण कर कोख से संसार मे प्रकट होता है अन्यथा स्पन्दन रहित मॉंस के निष्प्राण टुकड़े को तिलांजलि दे दी जाती है। सभी योनिगत प्राणियों की यही जीवन गति है। डाक्टर ह्रदय के स्पन्दन को सुनते है। स्पन्दनरहित मतलब प्राण रहित और मृत्यु की घोषणा कर देते है। हम किसी स्पन्दन विशेष को जीवन य मृत्यु की घोषणा के योग्य,चिकित्सीय रूप में समझते है।
थोड़ा और गहराई मे जाने का प्रयास करते है। स्पन्दन किस मे नहीं है? क्या धूल के एक छोटे कण ,पानी की एक बूँद ,हवा के एक अल़क्षित भाग,पेड़ य पौधे य बनस्पति के एक नन्हें टुकड़े मे नहीं है? विज्ञान की बात माने तो उसमें भी अणु है परमाणु है परमाणु के चारों विशेष आवृति मे घूमते इलेक्ट्रान। विज्ञान तो यह भी कहता है प्रत्येक वस्तु ( ठोस,द्रव,य गैस) इसलिए अलग अलग दिखता है क्योंकि प्रत्येक मे विभिन्न प्रकार का स्पन्दन है। कई स्पन्दन है जिन्हें हम अनुभव नहीं कर पाते परन्तु अनेक प्राणी अनुभव कर सकते है जैसे अल्ट्रासाउंड , अल्ट्रा वायलेट स्पन्दन,भूचाल के स्पन्दन का पूर्वाभास, कई प्राणी रक्त के एक बून्द की गंध मीलों दूर से ग्रहण कर लेते है, इत्यादि। तारो से आती हुई प्रकाश की किरणों की आवृत्ति (स्पन्दन ) से वैज्ञानिक जानते है वहाँ अर्थात् उन तारों मे कौन कौन से तत्व विद्यमान हैं।(Spectroscopy)प्रत्येक तत्व एक विशेष स्पन्दन वाली ऊर्जा प्रवाहित करता है। प्रत्येक ऊर्जा (प्रकाश, इन्फ़्रारेड, अल्ट्रावायलेट, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक, ग्रैविटेशनल, न्यूक्लिअर, रेडियो ,व माइक्रो वेव)स्पन्दन है।वैज्ञानिक ऊर्जा को तत्व और तत्व को ऊर्जा मे परिवर्तनीय मानने लगे है (E=mc2)। यदि हम ध्यान दे तो पूरे ब्रह्मांड मे एक कण भी स्थिर नहीं। एक कण से लेकर पूरा ब्रह्मांड एक विशिष्ट स्पन्दन मे आवृत है। किसी भी वस्तु मे स्वत: स्वंय को व्यक्त करने की शक्ति है चाहे ध्वनि के द्वारा,संकेतों के द्वारा, गंध के द्वारा, य किसी भी स्पन्दन द्वारा जिन्हें हम ग्रहण कर सकने के योग्य हो य न हो। हो सकता है कुछ स्पन्दन की दुनिया हमारे साथ साथ उपस्थित हो हमारी पाँचो इन्द्रियों की ग्राह्य क्षमता से परे हो। जिसे हम अपनी कल्पना मे भूत प्रेत जिन्न आदि नामो से कहानियों के माध्यम से जानते आए है।
अतएव एक विशिष्ट स्पन्दन की शक्ति ही प्राण है जिसमे जोड़ने की और विघटनकारी दोनो शक्तियाँ है और जो अनेक रूप मे इस सृष्टि मे समाया हुआ है। यह ब्रह्मांड प्राणमय है। प्राण के बहुत से रूप हम अपनी सीमित इन्द्रियों से अनुभव करते है। परन्तु बहुत से रूप हमारे साथ होते हुए भी हम उन्हें अनुभव नहीं कर पाते है। न अभी तक जान सके है। विज्ञान का अध्ययन सिर्फ़ प्राण के कुछ रूपों का अध्ययन मात्र है। चाहे वह भौतिक, रसायन, वनस्पति , प्राणी शास्त्र हो य प्रकृति के किसी अन्य रूप का अध्ययन शास्त्र हो।
हमारे शरीर में यही प्राण विभिन्न स्पन्दन युक्त होकर जागृत अंगों का निर्माण कर उनकी क्रिया सम्पादन का उत्तरदायी है।शरीर की प्रत्येक कोशिका मे प्राण स्थित है। योगियों ने मानव शरीर मे क्रिया सम्पादन के आधार पर पाँच प्राण के स्वरूप को निर्धारित किया है। प्राण. अपान, समान ,व्यान,और उदान। इन पाँचो प्राणो का योग मे बहुत महत्व है, और इनका विस्तृत विवरण विभिन्न उपनिषदों मे विस्तार से दिया गया है। यह भी बताया गया है कि इन प्राणो के द्वारा ही शरीर की अलग अलग क्रियाओं का संचालन होता है।
प्रत्येक आहार की कोशिकाओं मे भी विशेष प्राण होता है। हम रोगयुक्त तभी होते है जब प्राण का प्रवाह शरीर के किसी अंग मे सम्यक् नहीं होता है। शरीर के उस विशेष अंग मे प्राण का प्रवाह हम सामान्य य प्राकृतिक कर के रोगमुक्त हो सकते है। यदि विशेष आहार हम ग्रहण करें जिसमें आपेक्षिक स्पन्दन का प्राण हो जिसे हम औषधि कहते है। अतएव चिकित्सा अध्ययन भी एक प्रकार से ‘प्राण विज्ञान ‘ का एक स्वरूप है। प्राकृतिक बनस्पतियो से उपचार आयुर्वेद य प्राकृतिक चिकित्सा का रूप है।
प्राण ही आधार है जीवन का। शरीर के भीतर के प्राण को स्थिर करने केलिए सृष्टि मे विस्तारित प्राण को अपने श्वासों के आयाम से विभिन्न अंगों मे प्रवाहित करने को हम योग मे प्राणायाम कहतेहै। चूँकि प्रत्येक कोशिका में प्राणों का प्रवाह है , पूरा स्थूल शरीर अन्नद्वारा पोषित शरीर विभिन्न कोशिकाओं से निर्मित एक बृहद सम्मिलित रूप है। स्थूल शरीर जिसे अन्नमय कोष कहे प्राणो के अलक्षित,अध्वनित, सामान्यतः इन्द्रियों से अग्राह्यआवरण से आच्छादित है प्राणमय कोष य कारण शरीर कह सकते है।
2)प्राण ही रचयिता है-
स्मृति,मन,विचार,ज्ञान,बुद्धि,विवेक, आनन्द का।
प्रत्येक जीवित कोशिका जिसमें प्राण समाविष्ट है उसमें विकास की पूर्ण स्मृति जागृत होती है। उसका कितना विकास हो सकता है। पूर्ण विकास के बाद कब वह उत्तरोत्तर अवसान की ओर अग्रसर हो कर मृत्यु को प्राप्त होगा। सारी स्मृति एक जीवित कोशिका मे निहित है। जैसे एक बीज मे पूरी स्मृति निहित है कि वह कितना बड़ा पौधा होगा, कितने फल वह दे सकेगा, कब तक जीवित रहेगा अर्थात उसका जीवन काल पूर्णरूपेण मानचित्रित रहता है। दूसरे शब्दों मे उसकी पूरी जीवन गाथा बीज मे निहित रहती है। पौधों की स्वतंत्रता कुछ नहीं होती है। उसे बाह्य परिस्थितियों पर निर्भर रहना होता है। जैसे अति वर्षा, कम वर्षा,वायु , जल , मिट्टी की उपयुक्त मात्रा मे उपलब्धता। यदि पौधों मे चलने की स्वतंत्रता होती तो शायद वे चलकर उपयुक्त मिट्टी, जल, वायु , गर्मी का स्थान स्वयं चुन लेते और कुछ अधिक काल तक जीवित रह सकते। परन्तु यदि उनमें मन है तो उस मन को अपने अंगों को चालित करने की स्वतंत्रता नहीं है। वह स्वचालित है। अतएव उनका मन सीमित है। अवचेतन मन (Instinct Mind) ही उपलब्ध है। जो जन्म,विकास,अवसानऔर मृत्यु ही प्रतिपादित करते है अन्य कर्म की स्वतंत्रता नहीं है।
मानव बीज मे भी विस्तार की पूरी स्मृति है। अवचेतन मन है परन्तु चेतन मन (Conscious Mind)की उपलब्धता से वह परतंत्र नही है। वह अपने उपयुक्त वातावरण का चयन करने को स्वतंत्र है और यहीं से कर्म करने की स्वतंत्रता से बीज मे मानचित्रित जीवन मे विकास य विकार की सम्भावना का समावेश होता है और मन की विशालता का बोध होता है। मन का एक आयाम जुड़ जाता है ‘चेतन मन’। साथ ही शुरू होता है कर्म विधान और बीज मे मानचित्रित भाग्य मे कर्म सिंचित भाग्य भी सम्मिलित होता है। मन को पता है कि इस चेतन मन का क्षेत्र सीमित है। यह चेतन मन , पौधों मे उपस्थित मन से तो विकसित है पौधों के बीज मे निहित मन को ‘अवचेतन’ कहें तो प्राणी के चेतन मन के बाहर का क्षेत्र भी मन है जिसको हम ‘पराचेतन’ मन ( Super Conscious Mind or Intuitive Mind) कहसकते है।
बीज य कोशिकाओं मे निहित स्मृतियाे मे चेतन मन की क्रियाओं द्वारा उत्पन्न भावानुभूति भी स्मृति के रूप मे अंकित होती जाती है। स्मृतियों का विशाल भंडार मन के जिस प्रभाग मे संकलित होता उसे हम अर्धचेतन मन (Sub Conscious Mind)कहते है। अर्धचेतन मन पिछले जन्मों की सारी स्मृतियो के साथ इस जन्म की पल प्रति पल की सारी अनुभूतियों की स्मृति संजोये रखता है। जब भी चेतन मन को किसी भाव विशेष के क्षेत्र मे पड़ा देखता है तो अर्धचेतन मन उसी भाव की स्मृतियाँ चेतन मन को प्रेषित करता है। जैसे यदि चेतन मन प्रसन्न है तो अर्ध चेतन मन ख़ुशी की स्मृतियाँ चेतन मन को प्रेषित करेगा परन्तु यदि चेतन मन दु:खी है तो सारी दु:ख वाली स्मृतियाँ अर्ध चेतन मन को प्रेषित करेगा और व्यक्ति दु:खी से अति दु:खी हो जायगा। इसीलिए मनोवैज्ञानिक कहते है-‘हमेशा ख़ुश रहो, और दु:ख को मत सोचो’(Don’t worry be happy). अर्धचेतन मन बहुत शक्तिशाली है कितने जन्मों की स्मृति अपने मे समेटे है और इस जन्म की पल पल की स्मृति जन्म से मृत्यु तक की संग्रहीत करता है। चेतन मन को जब भी तमाम स्मृतियों के आधार पर कर्म करना होता है एक विकल्प को चुनना होता है। सारी स्मृतियों का धरातल जहाँ ज्ञान (Knowledge)की पृष्ठभूमि बनता है चेतन मन का वह भाग जो कर्म करने की दिशा निर्धारित करता है बुद्धि (Intelligence) कहलाता है। यदि बुद्धि एेसे कर्म की प्रेरणा देता है जो स्वयं केलिए व सभी के लिए और सम्पूर्ण जगत के लिए शुभ हो तो वह विवेक (Intellect) कहलाता है। ऐसे कर्म हो सकता है श्रेष्ठ हों पर इन्द्रियों के लिए प्रिय न हों। ऐसी अवस्था मे कठोपनिषद मे विवेक द्वारा श्रेय को चुनना और प्रेय को छोड़ना ही सत्य का मार्ग बताया गया है जैसा नचिकेता ने यम के द्वारा दिए वैकल्पिक वरदानों मे प्रेय को छोड़कर श्रेय को चुना और मृत्यु के रहस्य को जानने का वरदान चयनित किया।
इस प्रकार प्राण के साथ मन,और मन के साथ स्मृति, ज्ञान,बुद्धि व विवेक संलग्न हो जाता है। परन्तु इन सब के साथ चेतन मन की कर्म करने की स्वतंत्रता के कारण अहंकार का विशाल आवरण य कर्ता भाव प्रकट हो जाता है जो सदैव विवेक के साथ न होकर इन्द्रिय सुख की तरफ अधोगति को प्राप्त होता है। अहंकार का आवरण दूर कर विवेक संग जीने वाला आनन्दमय (eternal bliss) आत्मरूप को आत्मसात कर ब्रह्म रूप में जीवन जीता है।
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