प्रश्नोपनिषद ( ब्रह्म की सच्चाई का अनावरण )
- vinai srivastava
- Mar 17, 2023
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ब्रह्मज्ञानी एक ऋषि थे,
पिप्प्लाद था नाम ।
छ: ऋषि ज्ञान पाने को ,
पहुंचे उनके धाम॥१॥
ब्रह्म ऋषि ने ध्यान से देखा ,
समझी उनकी साध औ भक्ति।
वर्ष भर तुम करो तपस्या,
प्रथम यही थी उनकी उक्ति॥२॥
ध्यान तपस्या करके आओ,
प्रश्न फिर पूछो एक एक कर।
उत्तर मेरे ज्ञान मे होगा ,
तो बतलाऊं मै एक एक कर॥३॥
ऋषि कबंध के प्रश्न
कठोर तप किया ऋषि कबंध ने,
पूछा शीश नवाकर गुरु से ।
जो भी विचरण करे विश्व मे ,
प्राणिमात्र का उद्भव कैसे ॥४ ॥
मुस्कुराकर गुरु यह बोले ,
सृष्टिकर्ता ने ध्यान किया।
दो शक्ति निर्मित हुई ध्यान से ,
प्राण और रायी नाम दे दिया॥५ ॥
उद्भूत शक्ति बन गयी प्राण ,
रायी शक्ति देती आकार ।
दोनों के मिश्रित प्रयास से ,
प्राणी जन्मे भिन्न प्रकार ॥६ ॥
प्राण और रायी ने मिलकर के ,
निर्माण किया सृष्टि का कण कण।
प्राण बना जब सृष्टि का सूरज ,
चन्द्र रूप मे रायी क्षण क्षण॥७ ॥
किसी का होवे जब आकार ,
शक्ति रायी का हो आधार ।
प्राण संग मिलकर के यह ,
निर्मित करे प्रत्येक आहार॥८ ॥
हर दिशा मे सूर्य रश्मि सम,
विद्यमान है प्राण ।
सभी आहार को बीज रूप कर ,
डाले उसमे जान॥ ९ ॥
प्राण औ’ रायी के मिलने से,
वर्ष दो भागों मे विभक्त है ।
सूर्य गति हो दक्षिण दिक मे ,
दक्षिणायन मे वोह सशक्त है॥१० ॥
सूर्य की गति हो उत्तर दिक मे ,
उत्तरायण का नामकरण हो ।
मृत्यु वरण कर जो हो कवलित ,
सूर्य लोक को करे प्रयाण वो ॥११॥
मितव्वयिता ,तप औ’ ज्ञान,
जीवन बीते प्रेम ध्यान मे ।
जन्म चक्र से मुक्त हो जावे ,
समाधि जो ले उत्तरायण मे॥१२॥
जिन्हे रहे शिशु की आकांछा ,
दान धर्म के अनुयायी वो ।
मृत्यु अगर हो दक्षिणायन मे ,
पित्र लोक तब प्राप्त उन्हे हो ॥१३॥
फिर पृथ्वी पर पुनर्जन्म ले ,
आकांक्षा वो पूरी करते ।
उच्च धर्म मे लिप्त रह करके ,
चंद्रलोक की यात्रा करते ॥१४॥
निर्माण शक्ति को जो कोई पूजे,
शिशु जन्म के उपरांत।
ब्रह्मलोक लोक मे स्थिर होवे ,
ध्यान औ’ तप मे होके शांत॥१५॥
ब्रह्मलोक के अंतर मे है ,
सत्यलोक का आधार ।
नहीं पहुँचते वहाँ पर वे ,
जो धोखा दे और हों मक्कार॥१६॥
प्राण औ रायी काल से मिलके
महीने का करते निर्माण ।
कृष्ण पक्ष रायी का द्योतक,
शुक्ल पक्ष का मूल है प्राण॥१७॥
धर्म समर्पित शुद्ध कर्म ,
ऋषिगण करते शुक्ल पक्ष मे।
अधार्मिक, अज्ञान क्रियाएँ ,
करते मूरख कृष्ण पक्ष मे ॥१८॥
ऋषि भार्गव के प्रश्न
भार्गव ऋषि आदर से बोले ,
पवित्र श्रीमान हमे बताएं ।
कौन शक्तियाँ एक इकाई मे ,
तन को जोड़े औ ‘ रूप बनाएँ॥१९॥
कौन शक्ति सर्वोच्च कहायी,
कैसे प्रगट रूप मे प्रस्तुत ।
अन्य शक्तियाँ गौण् बनी क्यों,
सुनने को मै गुरुवर उत्सुक॥२०॥
गुरुवर भार्गव ऋषि को बोले,
जुड़े पाँच तत्व जब तन मे।
अन्तरिक्ष,वायु और अग्नि ,
जल थल बिखरे हरेक कोश मे॥२१॥
मन, वाणी, संग सभी इंद्रियाँ,
शक्ति रूप मे तन मे सज्जित।
गर्व इन्हे था वे सर्वोत्तम ,
तन में ही वे सबसे पूजित ॥२२॥
सब भूले उस प्राण शक्ति को,
जीवन का आधार रहा जो,
प्राण हुआ चलने को उद्यत ।
सभी शक्तियाँ बिखर चली त्यों॥२३॥
पूजा की सब शक्तियों ने ,
प्राण शक्ति तू सबसे ऊपर ।
पाँच तत्व के रूप मे तू ही ,
सभी शक्तियाँ तुझ पर निर्भर॥२४॥
अग्नि रूप मे ऊष्मा देते ,
सूर्य रूप मे तेज भी देते ।
मेघ रूप मे वर्षा करते ,
वायु रूप मे विचरण करते॥२५॥
चन्द्र रूप मे पोषण करते ,
तुम ही स्वयं को लक्षित करते।
सभी शक्तियों पर स्व शासन ,
इंद्रा की भांति तुम्ही तो करते॥२६॥
तुम अजर हो तुम अद्दृश्य हो ,
ऋक ,यजुर्व औ साम तुम्ही हो।
गति जीवन मे तुम्ही हो भरते ,
समिधा ,आहुति यज्ञ तुम्ही हो॥२७॥
तुम रचनाओं के स्वामी हो ,
योनि मे गर्भ रूप से चलते।
बार बार उत्पन्न तुम होकर ,
श्वास रूप से तन मे रहते॥२८॥
सभी शक्तियों की आहुति भी ,
अग्नि रूप मे लेते तुम ही।
संचालित कर सब अंगो के
शक्ति जीवन मे भरते तुम ही॥२९॥
तुम ही सृष्टि के कर्ता धर्ता,
सृष्टि के रक्षक,संघारक हो।
गर्मी देते विश्व को तुम ही
सूरज ,तेज सृष्टि के तुम हो॥३०॥
वर्षा रूप मे नभ से आते ,
प्राणियों को तुम हर्षाते ।
इच्छा जैसी भी करते वो ,
खाद्य पदार्थ तुम्ही से पाते॥३१॥
वाणी ,कर्ण, नेत्र मे तुम हो,
हृदय मे है वास तुम्हारा ।
तुम पवित्र हो ,पित्र तुल्य हो ,
सर्वत्र ज्ञान विज्ञान तुम्हारा॥३२॥
कौशल्य ऋषि का प्रश्न
कौशल्य ऋषि अब आगे आए ,
प्रश्न किया तब ब्रह्म ऋषि से।
प्राण भला किस तत्व से निर्मित ,
प्रवेश तन मे इसका कैसे ॥३३॥
कैसे इसने रूप धरे बहु ,
कैसे करता बहिर्गमन यह।
कैसे यह परिवेश को जाने ,
तन मन की अनुभूति करे यह॥३४॥
ब्रह्म ऋषि ने व्यक्त किया तब ,
वक्री है यह प्रश्न तुम्हारा ।
सत्यान्वेषी ब्राह्मण हो तुम ,
उत्तर है अधिकार तुम्हारा ॥३५॥
प्राण आत्मा की उत्पत्ति ,
प्राण आत्मा संग रहे है ।
वस्तु व उसकी छाया जैसे ,
कभी न बिछुड़े संग चले है॥३६॥
हृदय कमल मे स्थित स्व से ,
शतेक नाड़ी पाएँ प्रकाश ।
हरेक से शत शत नाड़ी ,
बहत्तर हज़ार फिर सूक्ष्मांश॥३७॥
अतृप्त इच्छा पूर्व जन्म की ,
प्राण लेकर तन मे जगता ।
जन्म के प्रारम्भिक पल मे ,
योग्य योनि मे पलने लगता ॥३८॥
जैसे एक राज्य मे राजा ,
भिन्न भिन्न अधिकारी रखता।
राज्य समूचा चले सुचारु ,
कर्तव्य सभी का निश्चित करता॥३९॥
प्राण तन के संचालन को ,
पाँच रूप मे स्वयं को करता।
हर पल सभी सम्बद्ध रहे ,
ऐसी युक्ति स्थापित करता॥४०॥
आँख, कान, मुख, नासिका मे,
मुख्य प्राण ही करता वास ।
बिसर्जन और जननांगों मे ,
‘अपान ‘ प्राण का है निवास ॥४१॥
‘ समान ‘ प्राण नाभि मे रहकर,
शासन पाचन तंत्र पर करता ।
चतुर्थ प्राण जिसे ‘व्यान ‘ है कहते ,
विस्तारित नाड़ियों मे होता ॥४२॥
पाँच प्राण जो है ‘उदान ‘
वो मेरुदंड मध्य स्थित रहता।
मृत्यु अवस्था मे गति करके ,
अगला जन्म निर्धारित करता॥४३॥
प्राण ‘उदान ‘ ऊष्मा शरीर की ,
निश्चित व निर्धारित करता ।
मृत्यु समय ऊर्ध्व गति करके ,
उच्च जन्म की नीव है रखता॥४४॥
अधोगति हो उदान प्राण की ,
अगला जीवन निम्न हो जाए।
पाप कर्म मे जब लिप्त रहा हो ,
मृत्यु लोक मे फिर आ जाए ॥४५॥
संपूर्ण सृष्टि का प्राण है सूरज ,
आँखों के प्राणों से लक्षित ।
अपान प्राण धरती की शक्ति ,
समान प्राण आकाश मे विस्तृत॥४६॥
वायु सृष्टि की व्यान प्राण है ,
उदान विश्व की ऊष्मा जाग्रत।
पंच प्राण जो स्थित तन मे ,
सारी सृष्टि मे भी विस्तृत ॥४७॥
जो विचार मृत्यु पल आता ,
प्राणो संग संयुक्त हो जाता।
अमिट छाप उदान मे करके ,
पुनर्जन्म निर्धारित करता ॥४८॥
प्राण का वर्णन श्रवण करे जो ,
यदि संचालन प्राणों का करले।
प्राण विभक्ति गर जाने समझे ,
अमर अवस्था निश्चित कर ले॥४९॥
गार्गेय ऋषि के प्रश्न
गार्गेय ऋषि आगे आए
ब्रह्म ऋषि को शीश नवाय।
आज्ञा लेकर गुरुदेव की ,
प्रश्न उनके सम्मुख लाये ॥५०॥
जब भी कोई प्राणी सोता
अंतरतम मे क्या है होता।
कौन भला जागता ,सोता ,
कौन स्वप्न का द्रष्टा होता॥५१॥
कौन हर्ष का अनुभव करता ,
दुख पाकर के रोता कौन ।
इंद्रियों का पा संकेत ,
भाव विभोर होता है कौन ॥५२॥
किया गुरु ने सूर्य को इंगित ,
रश्मि सहस्त्र चक्र मे मिलकर ।
सांझ बेला मे नित्य ही डूबे ,
सूरज संग क्षितिज मे जाकर ॥५३॥
ठीक प्रात को वैसे आवें,
छटा बिखेरें निकले जब दिन ।
ज्ञानेन्द्रिय मन –सूरज संग ,
सोवे जागे ऐसे प्रतिदिन ॥५४॥
प्राणी जब कुछ सुन न पावे ,
न देखे- सूंघे ,स्वाद न पाता ।
न छूए न पकड़े औ बोल न पावे ,
हम कहते है वो है सोता ॥५५॥
जाग्रत प्राण रहेंगे तब भी ,
आत्मा निकट मन हो रहता ।
भूतकाल के स्मृतियों संग ,
स्वप्न रूप मे खेल खेलता ॥५६॥
लीला विचित्र मन की होवे ,
पूर्व जन्म की इस जन्म की ।
सपनों मे झांकी दिखलाए ,
सत्य असत्य औ लख अलख की॥ ५७॥
गहन निद्रा मे आनंदित ,
मन का खेल शांत हो जाता।
पंच तत्व और बुद्धि अहं संग ,
आत्मा मे विश्रांति पाता ॥५८॥
पक्षी सभी रात्री बेला मे ,
आश्रय एक बृक्ष का पाते ।
सभी अवयव आत्म रूप के ,
आत्मा मे ही शांत हो जाते ॥५९॥
सत्य रूप मे आत्माशक्ति से ,
सभी इंद्रियों कार्य कर पाती ।
ज्ञान रूप से मन मे संचित ,
ब्रह्म रूप सबमे दर्शाती ॥६०॥
जाने जो भी आत्मरूप को,
तत्व ,प्राण ,मन इंद्रिय जैसा ।
अपना बिम्ब सभी मे देखे ,
प्राणी सभी हो स्वम के जैसा॥६१॥
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ऋषि सत्यकाम के प्रश्न
कर प्रणाम ऋषि सत्यकाम ने ,
गुरु से पूछी अपनी बात ।
ध्यान ॐ पर करे जो कोई ,
प्राप्ति क्या हो मरणोपरांत॥ ६२॥
गुरु बोले ,सत्यकाम सुन ,
व्यक्त य अव्यक्त रूप से ।
शर्त सहित य शर्त रहित हो ,
ॐ को जानो ब्रह्म रूप से ॥६३॥
बुद्धिमान यदि ध्यान करे और ,
ॐ का निश दिन जाप करे ।
साकार य निराकार मे ,
एक किसी को प्राप्त करे ॥६४॥
अर्थ बिना समझे भी कोई ,
ॐ शब्द य ध्वनि को ध्यावे ।
सिद्ध बने वो इस जन्म मे,
मर कर पुनर्जन्म वो पावे ॥६५॥
पुनर्जन्म मे मितव्ययी हो ,
तप ,विश्वास से ओतप्रोत हो।
शांत द्रढ़ी हो जीवन मे वो ,
अध्यात्म मे श्रेस्ठ्तम हो ॥६६॥
अर्थ समझ कर ॐ नाद का,
जीवन मे यदि ध्यान धरेगा ।
मृत्यु अनंतर सुख पूर्वक ,
चन्द्र लोक मे वास करेगा ॥६७॥
पुनर्जन्म फिर भी वो पाकर ,
पृथ्वी पर अवतरित ही हो होगा ।
ॐ का अर्थ हृदयंगम कर वो ,
भावी पथ पर कदम रखेगा ॥६८॥
पूर्ण चेतना मे स्थित हो ,
ॐ के परमात्म रूप पर ।
ध्यान करेगा जो भी मानव ,
वास करे वो ब्रह्म स्तर पर ॥६९॥
ऐसा आत्मसाक्षातकारी ,
प्रत्येक प्राणी मे ब्रह्म को देखे ।
मुख्य ॠडात्मक भाव ‘भय’ से ,
मुक्ति पा सिर्फ प्रेम बिखेरे ॥७०॥
=------
ऋषि सुकेश का प्रश्न
ऋषि सुकेश हाथ जोड़ कर ,
वंदन करके गुरु से बोले ।
हिरण्यनाभ ,थे राजकुंवर ,
कोशल राज के मुझसे बोले॥७१॥
आत्मशक्ति को समझ बूझ कर ,
तुम सुकेश ! एक बात बताओ ।
आत्मा के सोलह अवयव ,
यदि जानो तो मुझे गिनाओ ॥७२॥
अज्ञानी , मै बोल न पाया ,
झूठ बोलना मुझे न आया ।
चला गया फिर छोड़ मुझे वो ,
निरुत्तर जब मुझको पाया ॥७७॥
उसी प्रश्न का उत्तर सुनने ,
गुरुवर तेरी शरण पड़ा मै ।
आत्मा का निवास कहाँ है ,
यह भी है उत्कंठा मन मे ॥७४॥
कण कण रचकर इस जगत का ,
परमेश्वर ने किया विचार ।
रचना बंधन बांध सके ना ,
कहाँ जाऊं रचना के पार ॥७५॥
आत्मा ने जब रचा ‘प्राण’ को ,
‘प्राण’ से ‘इच्छा’ की उत्पन्न ।
‘पंच तत्व’, ‘इंद्रिय’,‘आहार’ संग,
सर्वोपरि रच रक्खा ‘मन’ ॥७६॥
आहार बना आधार ‘तेज’ का ,
‘आहुति’,’तप’ से ‘वेद’ महत्व।
आहुति से है ‘सृष्टि ‘ की रचना ,
और ‘नाम’ मिल सोलह तत्व॥७७॥
भिन्न भिन्न सरिताएं जैसे ,
सागर मे जा खो जाती है ।
नदियों का सब नाम तिरोहित ,
सागर रूप ही कहलाती है ॥७८॥
आत्मा के यह सोलह तत्व ,
आत्मा से ही निर्मित हो के ।
आत्म रूप मे जाते ढल ,
लुप्त आत्मा मे हो कर के ॥७९॥
जगत चक्र का परिधि रूप है,
धुरी चक्र का आत्म रूप है ।
सोलह तीली जोड़े उसको ,
सत्य ज्ञान का ध्येय आत्म है ॥८१॥
पिप्पलाद अब प्रेम से बोले ,
ऋषियों सुनो लगाकर ध्यान।
तुम सब ने जो उत्तर जाना ,
सत्य रूप मे है ब्रह्म ज्ञान ॥८२॥
परिक्रमा कर ब्रह्म ऋषि की,
साष्टांग कर के प्रणाम ।
हाथ जोड़ आदर सहित ,
उक्ति कही निष्काम॥८३॥
तुम हो ज्ञान के सागर प्रभुवर,
पिता तुल्य किए तुम उपकार।
सत्य ज्ञान का परिचय पाकर,
दूर हुआ मन का अंधकार ॥८४॥
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