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प्रतिज्ञा —-पौराणिक कहानियों में

  • Writer: vinai srivastava
    vinai srivastava
  • Mar 30, 2023
  • 3 min read

प्रतिज्ञा या संकल्प का जीवन में बहुत महत्व है। शास्त्रों में संकल्प को वादा (promise) , क़सम के भी रूप में पहचाना जाता है। जब संकल्प सिर्फ़ स्वयं के लिए लिया जाए और दूसरे उससे प्रभावित ना हों तो ऐसे संकल्प स्वयं के उत्थान के लिए होते हैं। हाँ ऐसे संकल्प भी होते हैं कि ´अब मैं स्वयं को समाप्त करूँगा क्योंकि अब ज़िंदगी में कुछ भी नहीं बचा ´। परंतु यह एक मानसिक विक्षिप्तावस्था की अवस्था बताता है। बुद्धि के स्तर पर लिया संकल्प नहीं है।

यदि संकल्प लेने का असर किसी दूसरे पर पड़े तो यह एक विशिष्ट भावना के अंतर्गत लिया संकल्प कहा जाएगा। इससे दूसरे का अनिष्ट भी हो सकता है और दूसरे का भला भी हो सकता है।

जैसे महाभारत में एक आख्यान आता है कि जब भीष्म ने अपने संकल्प को सत्यवती की अजन्मे पुत्र को राज्य दिलवाने , और अपने पिता की सत्यवती के प्रति कामुक आकर्षण को समर्पित किया और प्रतिज्ञा या संकल्प लिया की ‘मैं आजीवन विवाह नहीं करूँगा और राज्य की रक्षा करूँगा परंतु राज्य की बागडोर नहीं सम्भालूँगा ‘। जब सत्यवती के दोनो पुत्र विचित्रवीर्य और विचित्र अंगद राज्य चलाने के अयोग्य हुए तो सत्यवती ने भीष्म को प्रतिज्ञा तोड़ने को कहा। भीष्म यदि अपने संकल्प य प्रतिज्ञा को तोड़ देते तो महाभारत जैसी विभीषिका होने से बच जाती। ‘भीष्म प्रतिज्ञा ‘ समाज में एक कभी भी विचलित न होने वाली प्रतिज्ञा के रूप में बहुत प्रसिद्ध है।

एक और दृष्टांत पुराणों में आता है कि यम के हाथ में आया जीव पुनः मृत शरीर में प्रवेश नहीं करता। परंतु सावित्री जो सत्यवान की पत्नी थी सत्यवान की मृत्यु के बाद अपने बुद्धि से यम को उनके संकल्प से विचलित कर सत्यवान की आत्मा को पुनः मृत शरीर में स्थापित करवा देती है। केवल एक वरदान यम से माँग कर की मेरे पुत्र हों (वह सतयुग का कालखंड था पत्नी केवल एक पति के प्रति समर्पित रहती थी)। यम को अपना संकल्प तोड़ना पड़ा।

अब त्रेता युग की बात करें। यदि दशरथ ने केकयी को वरदान नहीं दिया होता तो क्या वह ‘राम के वनवास ‘ का वरदान माँग पाती। यदि दशरथ उस संकल्प या वरदान को तोड़ देते तो कैसे रामायण में कहा जाता -

‘ रघुकुल रीत सदा चली आयी प्राण जाए पर वचन न जायी ‘। दशरथ के प्राण इसी के चलते सचमुच चले ही गए।

फिर रामायण की कहानी कैसे चलती।

द्वापर में तो संकल्पों की बाढ़ आ गयी। हर कोई संकल्प लेने पर जैसे आमादा रहा। कुछ उद्धरण -

भीष्म - मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहूँगा।

अर्जुन - आज सूर्यास्त के पूर्व मैं जयद्रथ को मार डालूँगा।

द्रौपदी - जब तक मैं दुर्योधन के खून से अपने केश नहीं धो लूँगी अपने केश नहीं बाँधूँगी।

कृष्ण- पूरे युद्ध काल में मैं शस्त्र नहीं उठाऊँगा। मैं अपनी सेना के विरुद्ध रहूँगा। एक तरफ़ मेरी सेना होगी तो दूसरी तरफ़ निहत्था मैं।

युद्धिष्ठिर - मैं हमेशा सत्य ही बोलूँगा।

कर्ण- मैं कुछ भी दान करने को तैयार हूँ। चाहे वह मेरा कवच कुंडल ही क्यों न हो।

अब अगर आज के जमाने की बात करें अर्थात् कलियुग के काल खंड की बात करें कोई संकल्प य प्रतिज्ञा लेने को तैयार ही नहीं है। सुबह संकल्प लिया किसी ने की आज मैं सिगरेट नहीं पियूँगा। दिन भर सिगरेट ही नज़र आएगी और हो सकता है कि शाम तक संकल्प य क़सम टूट जाए और बाबूजी शाम तक सिगरेट फूँकते नज़र आएँ। जवान लोग सात ज़िंदगी साथ निभाने की प्रतिज्ञा करके कुछ ही दिन बाद ही डिवोर्स की अर्ज़ी देने वाले बन जाते हैं।

पहले प्रत्येक कर्म के पहले संकल्प लिया जाना कर्म करने की विधा थी। आजकल संकल्प की मर्यादा क़रीब क़रीब समाप्त हो चुकी है। क्या संकल्प है क्या कर्म है। दोनो में कोई सामंजस्य नहीं है। इसलिए मानसिक अशांति सर्वत्र परिलक्षित है। मन उद्वेलित है। मन को एकाग्र कर के शांत मन से पूरी मर्यादा और ईमानदारी से संकल्प से किया हुआ कर्म अवश्य सफ़लीभूत होगा। शांत मन के लिए मन को श्वासों पर केंद्रित करे। हिंदू धर्म में प्रत्येक पूजा में प्राणायाम करने के बाद संकल्प लेना अनिवार्य है।

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