‘पीड़ा क्यों?’
- vinai srivastava
- Mar 30, 2023
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कल मै एक पुस्तक पढ़ रहा था। गणेशपुरी आश्रम की गुरूमाई स्वामी चिद्विलासान्नन्द ने लिखी थी। कुछ अंश अपनी भाषा शैली मे उद्धृत कर रहा हूँ मित्रों के लिए। उनके विचार आमंत्रित है।
महाभारत मे वर्णित है कि इस संसार में किसी को पीड़ा क्यों होती है।
छ: प्रकार के लोग दुखी हैं;
जो दूसरों से द्वेष रखते है,
जो दूसरों से घृणा करते हैं,
जो असंतुष्ट हैं,
जो दूसरों पर आर्थिक रूप से निर्भर है,
जो संशयपूर्ण है,
जो क्रोधित हैं।
सत्य तो यह है, क्रोध ही अन्य पाँच स्थितियों की नियति है। क्रोध के आवेश में वाणी मे विष घुलना स्वाभाविक है। जब कोई पुरानी शिकायतों और पुराने दुखड़ों का पिटारा अभी भी लिए बैठा है: लोगों को जली कटी सुनाता है। बात बात पर आपा खो बैठता है। लोगों के कर्मों पर क्षोभ है, हर समय चिड़चिड. होता है तो सरलता एवं मधुरता का वातावरण उसके चारों तरफ निर्मित नही होगा। सच बात तो यह है, जब कोई क्रोध के द्वारा काम निकालता है तो वह विशेष प्रसन्नता नहीं देता बल्कि वह पहले अधिक दुखी होता है। अधिक दयनीय स्थिति तब होती है जब वह अपने क्रोध को इस प्रकार प्रकट करताहै कि उसे संसार की शोचनीय स्थिति पर बड़ा रोष है!ऐसा क्रोध किसी का हित नहीं करता बल्कि यह दायित्वहीनता पर आधारित है। इस श्रेणी के लोग अपने दुर्भाग्य को, अपनी कमियों के दोष को दूसरों पर मढ़ देते है। वे भगवान को दोष देते है पर अपने कर्मों को ठन्डे दिल से नही देखते। एक कहानी इस सम्बन्ध में इस प्रकार है।
एक साधु था, रमता योगी। नदी किनारे बैठा था। उसने प्रात: काल बड़े सुन्दर रूप में बितायी। स्वच्छ जल में स्नान किया, प्रार्थना -स्तुति की। उसके बाद एक धनी व्यक्ति के घर सुन्दर सुस्वादिष्ट भोजन किया। रसोइया बहुत धार्मिक था। उसने दो-तीन बार भर भर कर भोजन परोसा फिर उसने स्वादिष्ट पकवानों से भरी टोकरी में संध्या के लिए पर्याप्त भोजन रख कर साधु को विदा किया। सो कल कल झरना बह रहा है, सभी कुछ सुन्दर है अच्छा है। साधु आकन्ठ संतोष में डूबा हुआ है। अब और क्या चाहिए? हाँ , थोड़ा सुस्ता लिया जाय। एक घड़ी विश्राम।
साधु की नींद से भरी पलकें फड़फड़ाने लगी मकरंद पुष्प से पान करती आलसी तितलियों की भाँति। अभी वह नींद में डूबने ही वाला था कि उसने अखों के कोर से देखा कि एक धोबी किनारे किनारे उसी की दिशा मे आ रहा है। उसके साथ दो गधे है जिन पर गन्दे कपड़े लदे हैं। साधु सोचने लगा, ‘कहीं ऐसा न हो। यह धोबी इधर आ जाये। इस समय गपशप करने को मेरा मन नही है।...और दुर्गन्ध , हे भगवान्, वह कैसी दुर्गन्ध लायेगा। और वे गन्दे कपड़े, गन्दे गधे!’ साधु ने झट अपनी अॉंखे बन्द कर ली जिससे धोबी समझे कि वह सो रहा है।
किन्तु धोबी तो ठहरा धोबी। वह स्वतंत्र आदमी था। और तो और वह साधु से ज़्यादा स्वतंत्र था। वह चिल्ला कर बोला ,’’ऐ बाबा जी। मुझे घर जाना है, कुछ लाना था, जो भूल गया हूं। क्या इतनी देर आप मेरे गधों को देखते रहेंगे। आप तो साधु हैं हम सब के लिए कितना कुछ करतें है। मैं अभी आता हूँ। ‘’
वह पेड़ के नीचे आँखें मूँदे चुपचाप बैठा रहा , मानो उसने कुछ सुना नहीं। सोचा कि धोबी चला जायेगा। और सचमुच उसकी प्रार्थना सुन ली गई। उसे धोबी के जाने की पदचाप सुनाई पड़ी। पेड़ की ठंडी छांव मे उसे मीठी नींद आ गई। एक घंटे के बाद उसकी नींद खुली। धोबी वापस आ चुका था। पहाड़ी के ऊपर चढ़ते हुए पुकार पुकार कर चीख़ चीख़ कर बोल रहा था, ’’कहाँ है मेरे गधे?’ धोबी का चेहरा क्रोध से तमतमाया हुआ, भीषण क्रोध के साथ साधु से बोल रहा था, ‘’ मैने तुमसे कहा था, कि मेरे गधों पर नज़र रखना। तुमने ध्यान क्यों नही दिया? कैसे साधु हो तुम? जाओ मेरे गधे खोज कर लाओ। ‘’
एक पुरानी कहावत है,’चोरी और सीनाज़ोरी।’ जो ग़लती करता है उसे क्रोध भी आ जाता है। यही साधु को हुआ। क्रोध मे आगबबूला हो गया, ’’मै भगवान का भक्त हूँ। तुम मुझसे इस तरह बात नहीं कर सकते। सम्मान से बात करो। अरे। क्या करते हो? मुझे ठोकर मारते हो। हम तुम्हारे गधे हैं क्या?’’
धोबी बोला,’’ पता है तू साधू नहीं। गधे से भी गया गुज़रा है। ‘’
बस फिर क्या था! युद्ध शुरू हो गया। कभी कभी धोबी नीचे तो कभी साधू नीचे। धोबी कसरती व ताक़तवर था। साधू के भी भाग्य में कहाँ स्वादिष्ट पकवान और अब धोबी के लात घूँसे। दुर्गन्धपूर्ण धोबी मारते मारते और साधू मार खाते खाते थक गए। हाँफते हाँफते दोनो कीचड़ धूल मे सने भूमि पर लेटे रहे।
थोड़ी देर बाद साधू उठा मुँह पर पानी के छींटे डाला। बेचारे की मन की शान्ति गई साथ ही लड़ाई में पराजय मिली। एक चीज़ अभी भी पकड़ कर रखा था ‘क्रोध’। अब इस क्रोध को किस पर उतारे। धोबी से तो निपट चुका था।
सो, साधु आकाश की ओर देखते हुए पुकार कर बोला,’’हे भगवान। मै सारे जीवन तुम्हें पूजता रहा, स्मरण करता रहा, भजता रहा। पिछले तीस सालों मे एक दिन भी ऐसा नही बीता कि मैने तुम्हारा स्मरण न किया हो। मैने संसार छोड़ा पेड़ के नीचे सोता हूँ। कितनी बार मुझे पर्याप्त भोजन नहीं मिला, कन्दमूल खा कर भूख मिटाया। यह सब तुम्हारे लिए किया। परन्तु जब ज़रूरत पड़ी मुझे तुम्हारी तुम कहाँ थे। ‘’
कहते हैं कि जब तुम्हें भगवान की ज़रूरत हो मुसीबत के समय तो तुम भगवान की मुसीबत भी तो समझो। साधू यह जानना चाहता था कि जब धोबी उसके सीने पर बैठा उसे कूट रहा था उस समय भगवान क्या कर रहे थे?
ज्यों ही साधु बाबा ने अपना दुखड़ा रोना बन्द किया। तभी आकाश में एक वाणी गूँजी ,’’हे साधू। मै तेरी सहायता तो बहुत करना चाह रहा था। ज्यों ही तूने पुकारा मै आ भी गया था। मैं बचा भी लेता निश्चयपूर्वक। मै स्वयं तुझे ऊपर खींच लेता पर जब मैने नीचे देखा मुझे केवल क्रोध का उबलता लावा दिखा। मै देख नहीं पा रहा साधू कौन है और धोबी कौन।’’
ठीक ऐसे ही होता है। जब एक बार क्रोध उबलता है तो यह पता नही चलता कौन सही है और कौन ग़लत। कौन अच्छा आदमी है कौन बुरा। क्रोध कभी तुम्हारी सत्ता के कुछ अंश पर सवार न होकर सम्पूर्ण सत्ता को अपनी मुट्ठी मे कर लेता है। वह तुम्हारे रोम रोम से रिसता है। वह तुम्हारी कोशिकाओं मे घर बना लेता है। लाख कहो कि मैने छुपा लियाहै। पर वह छिपता नही है कर्म, से विचारों से प्रकट होकर रहता है। एक आदमी जो अपने क्रोध को वश मे करने का प्रयास नही करता है, अपना जीवन नर्क में बिताता है।
नरक क्या है? अपनी नकारात्मकताओं मे अपने गन्दे मन मे जीवन बिताना। यह प्रक्रिया बड़ी सूक्ष्म है। उनका मन क्रोध और अतृप्त इच्छाओं की तहों केनीचे दबा पड़ा रहता है।
अक्रोध - क्रोध से मुक्त होना- एक उत्कृष्ट सद् गुण है। उसके लिए अपने मन मे उठती भावना के दृष्टा बनते ही अक्रोध की स्थिति जागृति हो उठेगी क्यों कि तब तुम्हें जहाँ भावनाएँ चाहे नही ले जा सकेंगी। इसके लिए चिन्तन की निरंतरता की आवश्यकता है मन मे उठते भावों के प्रति। यही तो आत्म चिन्तन है।
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