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दया का पात्र (व्यंग)

  • Writer: vinai srivastava
    vinai srivastava
  • Mar 26, 2023
  • 3 min read


दया एक भाव है। इस भाव का प्रत्येक समाज और समाज के प्रत्येक इकाई अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति में होना मानवता का गुण है। इस भाव से विहीन व्यक्ति व समाज निर्दयी य अमानवीय कहलाता है। परन्तु आजकल इसका प्रयोग विभिन्न प्रकार से किया जाता है अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए। दया के लिए तीन चीज़ों का रहना ज़रूरी है। एक दया करने वाला दयालु, दूसरा दया पाने वाला दया का पात्र और तीसरी वह चीज़ जो दया करके दी जा रही है। आजकल बड़ा कन्फ्यूज़न है। दया करने वाला दयालु दया करने को तैयार है पर उसे पता नहीं क्या दया करें विशेषकर तब जब दया पात्र पूरा देश हो। बहुत से कन्फ्यूजन के अवतार दयालु का अर्थ ही ग़लत समझे। कहते हैं जो आलू दे वह दयालु। पर उन्होने दिमाग लगाया। देश के लोगों को तो आलू नहीं सोना चाहिए ख़ुश होने के लिए। आलू के दाम पिछली बार गिर गए थे तो लोगों ने आलू सड़कों पर यूँ ही फेंक दिया था। सो उन्होने कहना शुरू किया वे दयालु हैं आलू तो देंगे पर एक मशीन भी देंगे जिसमें एक तरफ से आलू वे डालेंगे पर दूसरी तरफ से तुम्हे सोना मिलेगा। अब वे दयालु खुद दया के पात्र बनते बोले ‘पर वोट तो भइया हमीं को देना’। ख़ैर छोड़िए मज़ाक़ की बात सोचिए यदि सचमुच तथाकथित दया करने वाले दयालु को दया का पात्र य कटोरा लिए कोई दयनीय नहीं मिला तो क्या होगा? क्योंकि बचपन से दयालु होने की उन्हें शिक्षा दी गई है। उनके पास भंडार के भंडार भरे पड़े हैं किसको क्या दे डाले? पर अफ़सोस उसे लेने वाले कम बचे हैं। जिसका कटोरा थोड़ा भरा नहीं कि मुए भाग लेते हैं कहते है हम अपनी दयालु पार्टी अलग से बनाएँगे। लो सुन लो बात। बहरहाल बहुत सारी दयालु पार्टी अपना दया का सागर लेके बैठी हैं; कुछ खड़ी भी हैं; कुछ दया का सागर लेके सोई पड़ी हैं क्योंकि उनको पता नहीं है कि दया दिखाऊँ कैसे। ‘कैसे मनाऊँ पियवा, गुन मोरे एकहू नाहीं ‘

लेकिन ऐसा नहीं है कि जिसके पास दया , मानवता बिलकुल नहीं हैं उनकी पूछ नही है समाज में, देश में।ऐसे लोग मार मार के कटोरा थमा कर किसी को भी दया का पात्र बना देते हैं। फिर अपना भंडार और भरते हैं और दया करने के लिए य दया पात्र खोजने में तत्पर हो जाते है। देश में अतीक भाई और मुख़्तार भाई जैसे बहुत दयालु इस श्रेणी में आते हैं जिनकी मदद हेतु बहुत सी दयालु पार्टी भी आ जाती हैं। परन्तु इनको भी कटोरा थमाने वाले बाबा कभी मिल ही जाते हैं। इधर ‘दया पात्रों ‘ की कहानी बड़ी विचित्र है थाली के बैगन जैसी। जिधर दाल थोड़ी गली नहीं कि दौड़े कटोरा लेके। फिर कटोरा भर जाय , दाल गिर जाय परवाह नहीं। उधर दाल , अरे वही दया का दाल , डालने वाला थाली पीट पीट कर दया पात्रों को सही ग़लत रिझाने में लगा है हल्ला मचाने में लगा है। पाँच साल बाद अपना कटोरा लेकर आएगा ‘ भइया! अपना वोट इसी कटोरे में डालना’ बहुत लोग जो ज़्यादा जानते नहीं है वही कहते है, ‘दाता एक राम भिखारी, सारी दुनिया’ वही कहते है ‘दाता हमेशा देता है कभी माँगता नहीं है। वही कहते है अज्ञानतावश यदि दाता राम को ही माँग लिया तो और माँगने की ज़रूरत ही क्या है। पर ज्ञानी लोग मन्दिर जाएँगे और भगवान से माँगेंगे कि वोट हमें दिलवाना उनको नहीं। सारांश यह है आज समाज में हर कोई अपना कटोरा लिए दयालु की खोज में है। पूरा समाज दया का पात्र है।

 
 
 

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