कौशल क्या है ? ( What is skill?)
- vinai srivastava
- Mar 30, 2023
- 3 min read
कौशल किसी भी कार्य को कुशलता पूर्वक सम्पन्न करने को कहा जा सकता है। बड़ी साधारण सी परिभाषा पर बहुत ही गूढ़ है। किसी भी कार्य को करने का अर्थ है कि कार्य करते हुए व्यक्त रूप से दिखे। यदि व्यक्त रूप से इस संसार में न दिखा तो इस संसार में आपने कुछ काम नहीं किया। ‘कुशलतापूर्वक करना’ तो बाद की बात है उस पर बाद में विचार करेंगे। बात है कार्य किया और सब ने अनुभव किया कि काम हो गया। यह अनुभव आँख ,नाक, कान, स्पर्श, स्वाद किसी के द्वारा हो सकता हो।
मान लीजिए कोई महाशय मन में बैठे बैठे एक अंतरिक्ष यान बनाते है बृहस्पति ग्रह पर जाकर ग्रह का चक्कर लगाकर वापस अपने आसन पर आ जाते हैं तो संसार की नज़रों में उन्होंने कोई काम नहीं किया। हाँ , यदि उन्होंने सचमुच हाथ पैर हिला कर संसार की वस्तुओं से बुद्धि लगाकर एक अंतरिक्ष यान बना डाला तभी दुनिया कहेगी कि महाशय में कुशलता है यान बनाने की। वरना बैठे बैठे सिवाय कुर्सी तोड़ने के और दिवा स्वप्न देखने वाला महाशय कहेगी वो भी तब जब आप व्यक्त करेंगे कि हम यान बना कर बृहस्पति ग्रह घूम आए बैठे बैठे।
अतएव काम करने का मतलब है कि कार्य ऐसा हो जो ‘संसार’ में सभी अनुभव कर सकें अपनी ज्ञानेंद्रिय (आँख ,नाक, कान, स्पर्श, स्वाद) द्वारा। ‘संसार’ मतलब जो आपके सम्पर्क में हैं या आ सकते हैं। इसमें ध्यान देने योग्य बात है ‘किए काम को व्यक्त करना’। किस कुशलता के साथ आप किए काम को व्यक्त करते हैं।
काम आपका नाकारा हो सकता परंतु यदि बड़ी कुशलता से व्यक्त किया आपने और आपके संसार ने मान लिया। तो आपके द्वारा किया काम बड़ी कुशलता से किया गया माना जाएगा। तमाम कुशल एडवरटाजर / प्रकाशक/ दवा वितरक/स्वनाम धन्य बाबा लोग यही तो कर रहें हैं कुशलता से।
मान लीजिए एक बहुत ज्ञानी प्रोफ़ेसर है स्वयं को क्लास में व्यक्त नहीं कर पाए। तो वो कुशल नहीं माने जाएँगे। दूसरे एक बहुत ज्ञानी प्रोफ़ेसर नहीं है परंतु अपनी बात क्लास में व्यक्त करने में माहिर है क्लास उन्हें ही कुशल प्रोफ़ेसर मानेगी ।अतएव ज्ञान का महत्व है परंतु अव्यक्त ज्ञान का इस संसार में कोई महत्व नहीं है। मानव के मस्तिष्क में पूरी सृष्टि का अव्यक्त ज्ञान हो सकता है परंतु यदि व्यक्त न हो सका तो इस संसार में कोई महत्त्व नहीं है। मनुष्य को व्यक्ति बनना होगा। अन्यथा कहावत चरितार्थ होगी ‘ जंगल में मोर नाचा किसने देखा।’
अब हम कुशलता पर आते है। प्रत्येक व्यक्ति का विचार ,ज्ञान , काम करने का तरीक़ा /सलीक़ा भिन्न भिन्न है। एक ही खाना एक व्यक्ति बनाए और दूसरा व्यक्ति बनाए दोनो के स्वाद में फ़र्क़ अनुभव किया जा सकता है। एक ही खाने को अलग अलग सलीक़े से परोसा जाए। लोगों का अनुभव खाने के बारे में अलग अलग होगा। ज्ञानी इस फ़र्क़ पर कहेंगे की बनाने वाले के या परोसने वाले के मन का भी प्रभाव पड़ता है खाने पर। कुछ ज्ञानी लोग तो कहेंगे कि खाने वाले के मन या मानसिक स्थिति का भी प्रभाव पड़ता है। जैसे प्राय: सभी को अपनी माँ के बनाए खाने के मुक़ाबले सारे पकवान फीके लगेंगे। अतएव कार्य करने की कुशलता किसी एक बात पर निर्भर नहीं करती है। किसी काम को करने का ज्ञान रखना ,व उसे सम्पन्न करना और उसे व्यक्त करना अलग अलग लोगों द्वारा अलग अलग होता है।
परंतु यह सत्य है की ध्यान पूर्वक किया हुआ काम सभी को समझ में आता है और उसे सभी अनुभव करते हैं।जैसे खाना बनाना एक कौशल है, परोसना दूसरा कौशल है। पहले का विस्तार है दूसरा। खाने वाले के मानसिक दशा का ध्यान यह तीसरा आयाम है उस कला के विस्तार का; चारों तरफ का वातावरण एक चौथा आयाम हो सकता है खाना खिलाने का। ध्यान ही कौशल पूर्वक काम करने की कुंजी है। जिस किसी ने अधिक से अधिक तथ्यों पर ध्यान देते हुए कार्य को सम्पादित किया वही अधिक कुशलता या कौशल के साथ काम करने में सफल होगा।
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