दर्द
Updated: Mar 26, 2022
क्या कोई इस दुनिया में ऐसा भी हो सकता है जिसने दर्द का अनुभव न किया हो? जन्म की प्रक्रिया का आरम्भ ही गर्भिणी केप्रसव वेदना य दर्द से होता है। दर्द भी एक तरंग , एक लहर (wave) है। दर्द काअन्तराल (wave length) भिन्न भिन्न हो सकता है। दर्द भी अनुभवानुसार कई प्रकार का होता है। जैसे, दर्दे दिल,मीठा दर्द,हल्का दर्द,मरोड़ , टपकन वाला दर्द, सिर दर्द, अधकपारी,जलन वाला दर्द, खुरचने वाला दर्द, चीरने वाला दर्द ,कोंचने वाला दर्द इत्यादि इत्यादि। एक दर्द ऐसा भी होता है जिसे प्रेम दिवाने ही समझ पाते है जैसा मीरा ने कहा-
‘हे री, मैं तो प्रेम दिवानी ,
मेरा दरद न जाने कोय। ‘
दर्द का इतिहास उतना ही पुराना है जितना ज़िन्दगी का इतिहास चाहे वह किसी भी जीव जन्तु से जुड़ा हो। बिना दर्द के जीवन का विकास सम्भव ही नही है। हो सकता है जब बीज फूट कर अंकुरित होता हो उसे भी दर्द होता हो परन्तु उसके नापने का कोई मापदंड य पैमाना इन्सान के पास नहीं है। श्री जगदीश चन्द्र बोस ने वैज्ञानिक प्रेक्षण से सिद्ध तो कर दिया कि पौधों मे जीवन होताहै वे वातावरण य परिवेश के भाव को अनुभव करते है। एक अच्छे संगीत का पौधों के विकास मे भी योगदान हो सकता है। परन्तु बृक्ष बोल नही सकते अपनी संवेदना व्यक्त नही कर सकते प्राणियों की भाँति। जब उन्हें काटा जाता है कैसा दर्द वे अनुभव करते होंगे, कैसे छटपटाते होंगे! हम शायद ही कभी समझ पायें।
कहने का अभिप्राय यह कि दर्द जीवन के आविर्भाव का सार है। बिना दर्द जीवन कैसा? किसी को देखकर य सोचकर किसी के दिल में दर्द उठ सकता है जो ,प्रेम का य घृणा का भाव य उसमें क्रोध, ईर्ष्या द्वेष,वैमनस्य पैदा कर सकता है। य दर्देदिल अनुभव कर किसी मे सहानुभूति य सहयोग य दया का भाव भी जाग सकता है। इसका अर्थ दर्द प्रत्येक संवेदना/भावना की जननी है। यह किसी को हिटलर जैसा बेदर्द य मजनूँ जैसा दर्देदिल बना सकती है। बहादुर शाह ज़फ़र ने क्या ख़ूब लिखा है-
दिल जो दर्द आशना नही होता,
वो किसी काम का नही होता।
आग और फूल में नहीं कुछ फ़र्क़ ,
हाथ जब तक जला नही होता।
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ज़िन्दगी के हुजूमें ग़म मे ज़फ़र ,
कोई खुद के सिवा नही होता।
अपने हिस्से का दर्द सभी को खुद ही सहना होता है। हाँ किसी के दो शब्द सांत्वना के उसके दर्द को सहने मे उत्प्रेरक का काम कर सकते है। सांत्वना देने वाले को कुछ न कुछ प्रयत्न तो करना हीपड़ता है। प्रयत्न और उससे संयुक्त तपस्या की जननी है दर्द। राजकुमार सिद्धार्थ यदि दर्द आशना न होते तो क्या किसी बूढ़े की दशा, किसी रोगी की कष्टकारी स्थिति , किसी की मृत्यु का दर्द महसूस करते और अपने कपिलवस्तु का राज्य, प्रिय सुन्दर पत्नी और पुत्र राहुल का त्याग कर तपस्या कर बुद्ध बनते? शायद बौद्ध धर्म का आविर्भाव न हुआ होता। इसका मूल दर्द मे छिपा है। ईसामसीह को क्रास पर लटकाया गया क्या वह दर्द की पराकाष्ठा नही थी? आज वही दर्द का चिन्ह ‘क्रास’ ईसाई धर्म का मूल चिन्ह है, जिसे प्रत्येक ईसाई धारण करताहै , पवित्र मानता है।
अतएव दर्द एक मूल अनुभूति है जो प्रत्येक अन्य भाव चाहे वह प्रेम , त्याग ,करूणा जैसे उच्च भाव हों य किसी को दर्द देने का निम्न भाव हो। दर्द देने वाले किसी को दर्द तभी देते है जब वह दर्द का मर्म न समझें। दर्द देना अपना आखेट समझे, भोजन समझे उसे यानि दर्द पाने वाले के दर्द की परवाह ही न हो। यह सब जन्म देते है भय, क्रोध, घृणा आदि।
जहाँ दूसरे के दर्द का हार्दिक अनुभव उच्च भाव को जन्म देता है वही दूसरे के दर्द को न अनुभव करना करूणा (Compassion) जैसे उच्च भाव का अभाव दर्शाता है।
अत: अपने दर्द के साथ साथ,अपने कृत्यों द्वारा दूसरो को हुए दर्द कोसमझना व निदान करना एक दैवीय गुण है।दर्द एक राह है ईश्वर तक जाने का और जब दर्द स्वंय ही राह , राही और मंज़िल हो तो वही ईश्वर का पर्याय है। बिना दर्द / कष्ट के इस संसार का कोई स्वरूप नही है जैसे बिना ईश्वर के संसार का कोई स्वरूप नहीं है।