भूमिका
- Vinai Srivastava
- Apr 9, 2022
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वेद सनातन हिन्दुओं का मूल ग्रन्थ है। चारों वेदों ऋग्वेद , सामवेद , अथर्ववेद ,एवं यजुर्वेद की रचना व रचयिता के काल की गणना ठीक ठीक प्राप्त नहीं है। कहते हैं इसकी रचना मूलत: ब्रह्मा के मुख से निकले शब्दों से हुई जिसे गणेश ने लिपिबद्ध किया है। इसके विषय वस्तु(content ) की चर्चा करें तो प्रत्येक वेद के दो मुख्य भाग हैं। प्रथम है कर्म और दूसरा है ज्ञान। दूसरे भाग को वेदान्त भी कहते हैं। वेदान्त के विचारों को उपनिषदों में विस्तार दिया गया हैं अधिकतर उपनिषद शिष्य द्वारा पूछे प्रश्न का गुरू द्वारा दिए उत्तर के रूप में हैं। एक वार्तालाप (dialogues) के रूप में उपनिषद् ग्रंथ है।कितने उपनिषद् है इसकी गणना नही मिलती। पर अब तक १०८ उपनिषद का संग्रह किया जा सका है। इसमें से १६ उपनिषद् शंकराचार्य ने चुना उसमें से १० उपनिषदों पर उनकी विस्तार से टीका उपलब्ध है। वे हैं-
प्रश्नोपनिषद्, ईशोपनिषद , माण्डूक्योपनिषद, कठोपनिषद , मुण्डकोपनिषद, तैत्तरीयोपनिषद, छान्दोग्योपनिषद, ब्रहदारण्योपनिषद,
केनोपनिषद, अत्रेयोपनिषद।
१६ उपनिषदों को शंकराचार्य ने आधिकारिक माना। उपरोक्त १० उपनिषदों की विषय वस्तु अन्य में दोहराई गई कई रूपों में। परम ब्रह्म के स्वरूप का अनुभव ज्ञान रूप मे अलग अलग १०८ उपनिषदों मे वर्णित है। पर वस्तुत: सभी १०८ उपनिषद एक रूप में एकाकार हैं। कुछ उपनिषद के मूल भाव का रूपान्तर काव्य रूप में करने का प्रयास मेरे विचारों द्वारा किया गया है। आशा है विद्वत् जन त्रुटियों को क्षमा कर अपने विचारों से अवगत कराने का कष्ट करेंगे।
1- मान्डूक्य उपनिषद:-
आओ हम सब जीवन के,
चार चरण को समझें जाने।
जाग्रत, सुप्त स्वप्न सहित और,
स्वप्न रहित, पर्यन्त पहचाने।।१।।
कानो से अच्छाई सुनकर,
सुंदरम को मन में धारें।
आँखों से सच्चाई देखें,i
सत्यम को हम ह्रदय में रख लें।।२।।
शांत चित और स्थिर होके,
मनसे जिसको पूजित कर दें।
सत्यम शिवम् सुन्दरम तीनो ,
जीवन को आलोकित कर दें।।३।।
मनकी सीमा के बाहर जो ,
ब्रह्म आत्मा का स्वरूप है।
ॐ शब्द से जो है चिन्हित,
ब्रह्मांड का दिव्य रूप है।।४।।
आत्म शक्ति से निर्मित जीवन ,
तीन रूप में विश्व में विस्तृत।
प्रथम रूप है 'वैश्वानर ' का,
उन्निस गुणों से यह है पूरित।।५।।
बाह्य जगत के प्रति सचेत यह ,
अंतर्मन है इसकी शक्ति।
दस इन्द्रिय, अहं और बुद्धि,
पाँच प्राण संग ह्रदय में रहती।।६।।
समग्र कुशलता प्राणिमात्र की,
‘वैश्वानर’ स्थिति में प्रतिबिम्बित।
श्वास पवन है नेत्र हैं सूरज,
चरण भूमि बन भूमि में रोपित।।७।।
काया का विस्तार ज्यों अंतरिक्ष,
अग्नि ह्रदय में ज्यों धारित हो।
ब्रह्मांड का तरल पेट में,
मस्तक में ही स्वर्ग निहित हो।।८।।
द्वितीय प्रकृति आत्म जीवन का ,
शुद्ध मानसिक रूप में निखरे।
दसों इन्द्रिय शिथिल पड़े जब,
तेजस नामक स्थित उभरे।।९।।
ज्ञानेन्द्रिय अंतर्मुख होकर,
स्वप्न कल्पना में स्व विचरे।
सुसुप्तावस्था कर्मेन्द्रियों की,
‘तेजस’ स्थिति तब ही निखरे।।१०।।
तृतीय रूप में स्व जागृत हो,
सुसुप्तअवस्थास्वप्नरहितहो।
प्रज्ञा में स्व निर्धारित हो ,
बुद्धि ,कालऔर अहम परे हो।।११।।
अ, उ, म के तीन वर्ण से,
ॐ शब्द का रूप निखरता।
वैश्वानर,तेजस और प्रज्ञा,
तीनों का निरूपण करता।।१२।।
इन तीनों स्थिति से ऊपर ,
तू रीय अवस्था जिसको कहते।
मन बुद्धि और अहम कभी भी ,
इस स्थिति को छू नहीं सकते।।१३।।
तूरीय अवस्था में स्थित स्व,
वर्णन जिसका हो न पाए।
जो भी पहुँचे इस स्तर पर,
पूर्ण ब्रह्म बन दिव्य हो जाए।।१४।।
—क्रमश:
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