उपनिषद्सरल हिन्दी काव्य में
- rrichaasrivastava
- Jun 15, 2022
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भूमिका-
वेद सनातन हिन्दुओं का मूल ग्रन्थ है। चारों वेदों ऋग्वेद , सामवेद , अथर्ववेद ,एवं यजुर्वेद की रचना व रचयिता के काल की गणना ठीक ठीक प्राप्त नहीं है। कहते हैं इसकी रचना मूलत: ब्रह्मा के मुख से निकले शब्दों से हुई जिसे गणेश ने लिपिबद्ध किया है। इसके विषय वस्तु(content ) की चर्चा करें तो प्रत्येक वेद के दो मुख्य भाग हैं। प्रथम है कर्म और दूसरा है ज्ञान। दूसरे भाग को वेदान्त भी कहते हैं। वेदान्त के विचारों को उपनिषदों में विस्तार दिया गया हैं अधिकतर उपनिषद शिष्य द्वारा पूछे प्रश्न का गुरू द्वारा दिए उत्तर के रूप में हैं। एक वार्तालाप (dialogues) के रूप में उपनिषद् ग्रंथ है।कितने उपनिषद् है इसकी गणना नही मिलती। पर अब तक १०८ उपनिषद का संग्रह किया जा सका है। इसमें से १६ उपनिषद् शंकराचार्य ने चुना उसमें से १० उपनिषदों पर उनकी विस्तार से टीका उपलब्ध है। वे हैं-
प्रश्नोपनिषद्, ईशोपनिषद , माण्डूक्योपनिषद, कठोपनिषद , मुण्डकोपनिषद, तैत्तरीयोपनिषद, छान्दोग्योपनिषद, ब्रहदारण्योपनिषद,
केनोपनिषद, अत्रेयोपनिषद।
१६ उपनिषदों को शंकराचार्य ने आधिकारिक माना। उपरोक्त १० उपनिषदों की विषय वस्तु अन्य में दोहराई गई कई रूपों में। परम ब्रह्म के स्वरूप का अनुभव ज्ञान रूप मे अलग अलग १०८ उपनिषदों मे वर्णित है। पर वस्तुत: सभी १०८ उपनिषद एक रूप में एकाकार हैं। कुछ उपनिषद के मूल भाव का रूपान्तर काव्य रूप में करने का प्रयास मेरे विचारों द्वारा किया गया है। आशा है विद्वत् जन त्रुटियों को क्षमा कर अपने विचारों से अवगत कराने का कष्ट करेंगे।
मान्डूक्य उपनिषद:
आओ हम सब जीवन के,
चार चरण को समझें जाने।
जाग्रत, सुप्त स्वप्न सहित और,
स्वप्न रहित, पर्यन्त पहचाने।।१।।
कानोसेअच्छाईसुनकर,
सुंदरमकोमनमेंधारें।
आँखोंसेसच्चाईदेखें,i
सत्यमकोहमह्रदयमेंरखलें।।२।।
शांतचितऔरस्थिरहोके,
मनसेजिसकोपूजितकरदें।
सत्यमशिवम्सुन्दरमतीनो,
जीवनकोआलोकितकरदें।।३।।
मनकीसीमाकेबाहरजो,
ब्रह्मआत्माकास्वरूपहै।
ॐशब्दसेजोहैचिन्हित,
ब्रह्मांडकादिव्यरूपहै।।४।।
आत्मशक्तिसेनिर्मितजीवन,
तीनरूपमेंविश्वमेंविस्तृत।
प्रथमरूपहै'वैश्वानर' का,
उन्निसगुणोंसेयहहैपूरित।।५।।
बाह्यजगतकेप्रतिसचेतयह,
अंतर्मनहैइसकीशक्ति।
दसइन्द्रिय, अहंऔरबुद्धि,
पाँचप्राणसंगह्रदयमेंरहती।।६।।
समग्रकुशलताप्राणिमात्रकी,
‘वैश्वानर’ स्थितिमेंप्रतिबिम्बित।
श्वासपवनहैनेत्रहैंसूरज,
चरणभूमिबनभूमिमेंरोपित।।७।।
कायाकाविस्तारज्योंअंतरिक्ष,
अग्निह्रदयमेंज्योंधारितहो।
ब्रह्मांडकातरलपेटमें,
मस्तकमेंहीस्वर्गनिहितहो।।८।।
द्वितीयप्रकृतिआत्मजीवनका,
शुद्धमानसिकरूपमेंनिखरे।
दसोंइन्द्रियशिथिलपड़ेजब,
तेजसनामकस्थितउभरे।।९।।
ज्ञानेन्द्रियअंतर्मुख होकर,
स्वप्नकल्पनामेंस्वविचरे।
सुसुप्तावस्थाकर्मेन्द्रियोंकी,
‘तेजस’ स्थितितबहीनिखरे।।१०।।
तृतीयरूपमेंस्वजागृतहो,
सुसुप्तअवस्थास्वप्नरहितहो।
प्रज्ञामेंस्वनिर्धारितहो,
बुद्धि,कालऔरअहमपरेहो।।११।।
अ, उ, मकेतीनवर्णसे,
ॐशब्दकारूपनिखरता।
वैश्वानर,तेजसऔरप्रज्ञा,
तीनोंकानिरूपणकरता।।१२।।
इनतीनोंस्थितिसेऊपर,
तूरीयअवस्थाजिसकोकहते।
मनबुद्धिऔरअहमकभीभी,
इसस्थितिकोछूनहींसकते।।१३।।
तूरीयअवस्थामेंस्थितस्व,
वर्णनजिसकाहोनपाए।
जोभीपहुँचेइसस्तरपर,
पूर्णब्रह्मबनदिव्यहोजाए।।१४।।
—क्रमश:
—- —— —— ——— ——- ——- ——
ईशोपनिषद:
मूलतथ्य
जीवन सांसारिक अलग रहा,
अध्यात्मिक जीवन भिन्न रहा।
क्या जीवन के इन रूपों मे,
तारतम्य कभी भी नही रहा।।१।।
क्या कर्म का ज्ञान अलग हुआ,
विधान कर्म का बदल गया।
डगर बदल कर जब कोई,
ईश्वर की राह पर चला गया।।२।।
बिन कर्म फल मे लिप्त हुए,
बिन पूर्वाग्रह और अहम जगे।
यदि काम कोई भी किया करे,
प्रभु की राह मे वही लगे।।३।।
संसार त्याग कर यदि कोई,
सोचे वह ईश्वर पाएगा।
अहम्,स्वार्थ व लालच रख,
दोनो से दूर हो जायेगा।।४।।
कर्म, त्याग का गहरा रिश्ता,
परित्याग करे जो अहंकार का।
करे कर्म, बिन स्वार्थ व लालच,
वही राह है परम आत्म का।।५।।
त्याग, कर्म का लक्ष्य है ईश्वर,
आत्म रूप अन्तर में जाने।
बाह्य रूप में ब्रह्म है विस्तृत,
ईश्वर को वह तब पहचाने।।६।।
धरा गगन में जो भी दीखे,
ब्रह्मरूप से वह है पूरित।
जो भी इन्द्रिय पकड़ न पाए,
पूर्ण ब्रह्म उसमें भी रोपित।।७।।
ब्रह्म कभी विच्छिन्न न होवे,
रंग रूप आकार बनावे।
परिवर्तन से न परिवर्तित,
एक रूप और नित्य कहावे।।८।।
तत्त्व है जो भी सृष्टि में,
केन्द्र में उसके ईश्वर जानो।
सत्य यही है जीवन भर का,
त्याग असत्य सत्य पहचानो।।९।।
इसी सत्य पर ध्यान करे जो,
और रहे उसमें आनन्दित।
गुप्त धन इसको न जानो,
सबको करे यह भाव प्रफुल्लित।।१०।।
संतोषी सौ वर्ष जिएगा,
निष्काम भाव जो कर्म करेगा।
अभीष्ठ फल यदि न भी पावे,
निष्ठा कर्म में पूर्ण करेगा।।११।।
अज्ञानी और क़ातिल मर कर,
प्रवेश ऐसे लोक में पावे।
सूर्य जहाँ हो एकदम दुर्लभ,
अंधकार युक्त जीवन पावे।।१२।।
बिन आत्मा जीवन कैसा,
उसका तो आस्तित्व नही है।
इन्द्रियों से परे है आत्मा,
विचारों से तीव्र गति है।।१३।।
विश्वात्मा एक रूप में,
स्थिर पर गतिमान लगे ये।
अज्ञानी इसे दूर ही समझें,
बाहर भीतर एक रूप ये।।१४।।
जो किसी से घृणा न करता,
आत्मा मध्य प्राणी ही देखे।
और आत्मा के अलख रूप को,
हर प्राणी के अन्दर देखे।।१५।।
बुद्ध वही हो पावे जग में,
पावे ब्रह्म आत्मा ही है।
कष्ट औ’ शक से परे रहे वो,
एक ब्रह्म से पूरित जग है।।१६।।
आत्मा तो सर्वत्र व्याप्त है,
कई नाम से लोग पुकारें।
स्वयंभू , दृष्टा, चिन्तक होकर,
ज्ञानी इसे सर्वोच्च बतावें।।१७।।
हड्डी , माँस , शरीर नही ये,
पूर्ण समर्थ निष्कलंक रहे ये।
न ये किसी काल से बाधित,
सभी बुराई से अछूत ये।।१८।।
वे जीते मरते अंधकार में,
जो सिर्फ़ समर्पित रहते जग मे।
गगन अंधेरा उन्हें भी घेरे,
रखते केवल ध्यान स्वयं में।।१९।।
खुद पर जो ध्यान हैं धरते,
निश्चित स्वार्थ है उनका अपना।
रखे ध्यान जो विश्ववृत्ति पर,
पांए जग का द्वितीय सपना।।२०।।
ऐसे प्राणी धन्य हैं जग में,
विश्व समर्पित होकर के भी।
ध्यान आत्म पर केन्द्रित करके भी,
पाएँ शान्ति अमरता को भी।।२१।।
सूर्य , अग्नि की स्वर्णिम रश्मि,
सत्य जीव का छिपा है तुममें।
पालनकर्ता, केवल दृष्टा,
वरदानी है तेज़ है जिस में।।२२।।
क्रमश:
( अगला उपनिषद मुण्डकोपनिषद)
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मुंडकोपनिषद:
कथा सार
अच्छा सुन कर कानों से,
दृश्य नेत्र भी देखें जो।
शारीरिक विश्रान्ति भी देवें,
मन को शान्ति प्रदान करे जो।।१।।
रचना के इस सागर में,
उद्भव ब्रह्म की सर्व प्रथम है।
आविर्भाव फिर अन्य देव का,
ब्रह्मांड का रक्षक ब्रह्म है।।२।।
प्रथम पुत्र है अथर्व ब्रह्म का,
ज्ञान ब्रह्म का उसने पाया।
सभी ज्ञान का मूल वही हैं,
ब्रह्म ने उसको यह समझाया।।३।।
अंगी ऋषि ने उसी ज्ञान को,
अथर्व के देने पर जब पाया।
फिर बाँटा उसे सत्यबाह संग,
अंगीरास फिर उसको पाया।।४।।
सौनक नाम गृहस्थ एक थे,
अंगीरास के पास आ बोले।
हे पवित्र! किस ज्ञान के द्वारा,
किसी अन्य को हम समझा लें।।५।।
अंगीरास ने मृदु स्वरों में,
ज्ञान के दो रूप बताए।
निम्न रूप है ज्ञान वेद का,
उच्च रूप नित्य सत्य जताए।।६।।
शब्द ज्ञान, फिर लय औ ध्वनियाँ,
ज्योतिष विद्या है निम्न ज्ञान से।
उच्च ज्ञान से जुड़े जो कोई,
जुड़ जावे वह मूल स्त्रोत से।।७।।
नेत्र नहीं है, कर्ण नहीं है,
पादरहित औ’ हस्तरहित जो।
अकारण अपरिभाषित ब्रह्म,
सूक्ष्म, सर्वत्र औ’ अंतरहित जो।।८।।
मकड़ी रचे स्वयं के जाले,
करे समाहित स्वयं उसे ही।
मिट्टी पैदा करे बृक्ष को,
ब्रह्म रचे सृष्टि वैसे ही।।९।।
ब्रह्म के स्वेच्छास्वरूप से,
निर्मित हुई सृष्टि की काया।
शक्ति प्राथमिक उदय हुई तब,
जिसने मन को ही रच डाला।।१०।।
मन से हुए सूक्ष्म तत्त्व निर्मित,
जिसने लोकान्तर औ’ लोक बनाया।
प्राणियों ने कर्म के द्वारा ,
कारण, फल का खेल रचाया।।११।।
प्रत्येक लोक में कारण-फल से,
उदय हुआ फिर दंड विधान।
अच्छे कर्मों के बदले में ,
पुरस्कार बन गया निदान।।१२।।
साक्ष्य बना तब ब्रह्म सभी का,
बुद्धि, अलौकिक, नाम, आकार।
जान सभी कुछ ज्ञान बना तब,
वस्तु और जीव बना आधार।।१३।।
लोग कर्म की आहुति देकर,
अल्पकालिक फल को हैं पाते।
भ्रमित हैं वे सब ही जो,
सबसे अच्छा इसे मानते।।१४।।
विद्वान घमंडी अज्ञानवश,
भ्रमित व्यक्ति को राह दिखाते।
जैसे एक अंधा ठेल ठेल कर,
किसी अंधे को गोल घुमाते।।१५।।
अज्ञानता के अंधकार में ,
भ्रमित स्वयं को श्रेष्ठ मानते।
सिर्फ़ कर्म से बँधे व्यक्ति ,
ईश्वर को फिर जान न पाते।।१६।।
कर्म उन्हें स्वर्ग दिखलाता,
दुख का कारण जा नही पाता।
पुनर्जन्म के रूप में उसको,
धरती पर फिर लेकर आता।।१७।।
स्वनियंत्रित, शान्त, मनस्वी,
मितव्ययी, संतोषी, ध्यानी।
अशुद्धियों से मुक्त होकर के,
अमर सत्य को पावें ज्ञानी।।१८।।
अध्यात्म मनुज का ध्येय अगर है,
सावधान हो कर्म को समझे।
क्षणभंगुर सुख मिले कर्म से,
शाश्वत की उपलब्धि न समझे।।१९।।
संसार य सांसारिक वस्तु को,
त्यागे और ध्यान में लागे।
ब्रह्म भक्त और शास्त्र निपुण जो,
ऐसे गुरू के शरण में जागे।।२०।।
स्वनियंत्रित शान्त भक्त जो,
आदर सहित समर्पित गुरू को।
शाश्वत सत्य रूप आत्म का,
गुरू से प्राप्त होय शिष्य को।।२१।।
जैसे शोले आग से उड़ कर,
वापस अग्नि समर्पित होते।
अनश्वरता के गह्वर में फिर,
जीव निर्जीव समाहित होते।।२२।।
स्वयं प्रकाशित आत्मरूप का,
आकार कोई भी नहीं सिद्ध है।
जन्म,श्वास और मन विहीन हो,
बाहर भीतर वही शक्ति है।।२३।।
उत्पन्न उसी से पावक,जल,थल,
आकाश, वायु, मन उसी से निर्मित।
श्वास इन्द्रियाँ अनुभव करती,
उसी से जुड़कर उसी से प्रेरित।।२४।।
सूर्य चन्द्र हैं नेत्र उसी के,
विराट रूप में स्वर्ग ही सिर है।
दिक् दिगान्तर कान हैं उसके,
वायु उसका श्वास रूप है।।२५।।
सृष्टि उसी का ह्दय जान लो,
पैरों से धरती है निर्मित।
उसकी उक्ति है शास्त्र की उक्ति,
आत्म रूप से स्वयं ही सृजित।।२६।।
सूर्य उसी की शक्ति रूप से,
करे प्रकाशित पूर्ण गगन को।
वर्षा उतर कर फिर गगन से,
निर्मित करे आहार-बीज को।।२७।।
बीज जब ही हो पूर्ण समर्पित,
पुरूष तत्व से स्त्री तत्व को।
स्वीकार करके इस कर्म को,
उत्पन्न करे वो भिन्न जीव को।।२८।।
भक्ति प्रार्थना शास्त्र कर्म औ’
आहुति को उत्पन्न करे वो।
करे कार्य ,कर्ता निर्धारित,
काल विभाजन करे शक्ति वो।।२९।।
विभिन्न वंश के देव उसी से,
पक्षी,मानव , वन्य जीव सब।
देवदूत भी उसी की शक्ति,
ध्यान, विश्वास, नियम और तप।।३०।।
ज्ञान कर्म की सभी इन्द्रियाँ ,
उद्देश्य , क्रियाएँ उससे पाते।
सागर, पर्वत, नदियाँ बनकर,
जीवन उपयोगी तत्त्व बनाते।।३१।।
सहाय जब भी वो होता है,
जीवन को गति वो देता है।
स्थूल शरीर स्थूल जगत में,
सूक्ष्म शरीर भी वो भरता है।।३२।।
इसी प्रकार हो ब्रह्म सभी में,
कर्म, ज्ञान, अच्छाई बनता।
ह्रदयकमल में ज्ञात रहे वो,
बद्ध गाँठ जब ज्ञान का खुलता।।३३।।
स्वप्रकाशित ब्रह्म ह्रदय में,
शरण दे, उद्देश्य है सबका।
उसी में स्थित जीव चराचर,
स्तुत्य , सर्वोच्च आधार सभी का।।३४।।
सभी विश्व में व्यापक होकर,
सूक्ष्म से भी सूक्ष्म बनकर।
विद्यमान अनश्वर होकर,
प्राप्य योग्य उद्देश्य बनकर।।३५।।
उपनिषदों को धनुष रूप दे,
तीव्र भक्ति के तीर को साधे।
मन ह्रदय में प्रेम पगा कर,
नश्वरहीन ब्रह्म को बींधे।।३६।।
ओम कमान औ’ व्यक्ति तीर हो,
ब्रह्म ही उसका लक्ष्य बेध हो।
शान्त ह्रदय से जो संधाने,
ब्रह्म में घुसकर ब्रह्म बने वो।।३७।।
धरती ,गगन, स्वर्ग और मन,
सभी इन्द्रियाँ ब्रह्म में निर्मित।
उसी को जानो स्वंयभू रूप से,
अमरत्व पुल से वह निर्मित।।३८
ह्रदय कमल है वास ब्रह्म का,
चक्र तीलि स्नायुएं मिलती।
ओम रूप में ध्यान वहाँ कर,
तिमिर जगत की ज्योति से मिलती।।३९।।
बैठ ह्रदय के सिंहासन पर,
ब्रह्मांड में कीर्ति बिखेरे।
सब कुछ जाने, सब कुछ समझे,
सबमे आत्म रूप में निखरे।।४०।।
विशुद्ध मन ही आत्म रूप में,
ह्रदय में स्थित हुआ है जाने।
यह स्वामी है तन, प्राण का,
कृपा पूर्ण ध्यानी मन जाने।।४१।।
जब खुलती अज्ञान की गाँठें,
प्रभावहीन हों कर्म गति भी।
साक्षात् हो उस सत्ता से,
जो व्यक्ति गत हो व्यक्ति परे भी।।४२।।
जो जाने निज आत्म रूप को,
कामना रहित विशुद्ध अविभाजित।
ह्रदय कमल में ब्रह्म को पावें,
जो प्रकाश को करे प्रकाशित।।४३।।
धरती पर उत्पन्न अग्नि हो,
य हो सूरज चाँद सितारे।
सभी प्रकाशित तब ही होवें,
स्व प्रकाश जब ब्रह्म बिखेरे।।४४।।
ब्रह्म ‘काल’ में आगे पीछे,
सभी दिशा में विद्यमान हो।
ऊर्जा सभी उसी से पाकर,
शक्ति रूप से उच्च बने वो।।४५।।
दो पक्षी के पंख सुनहरे,
दोनो पृथक कभी न रहते।
एक बृक्ष पर बैठे दोनो,
सिर्फ़ एक पक्षी फल खाते।।४६।।
फल खाने वाला पक्षी ही,
भ्रमित दु:खी हो शान्ति न पाता।
पक्षी द्वितीय है, रूप उसी का,
साक्षी बन ब्रह्म शान्ति को पाता।।४७।।
जीवात्मा है पक्षी जगत का,
फल अहं का खाता औ’ रोता।
दूसरे अपने मूलरूप को ,
न पहचाने और भूल कर खोता।।४८।।
ज्यों ही अपने द्वितीय रूप को,
जीवात्मा बस निरख ही पाती।
पहचान दिव्य सत्य रूप को,
चादर दु:ख की स्वंय उतारती।।४९
दृष्टा जब दृष्टिपात कर,
तेजस्वी स्वरूप में आता।
पाप पुण्य के स्तर से उठ,
एकाकार उसी में होता।।५०।।
ब्रह्म सभी प्राणी में स्थित,
जीवन रूप में हैं परिलक्षित।
तेजोमय इस सत्य को जाने,,
विनम्रता में बुद्धि हो दीक्षित।।५१।।
विवेकी ऐसे जो प्राणी हैं,
स्वयं को आगे करें न प्रस्तुत।
विनम्रता हो उनका गहना,
प्रेमानन्द हो स्वात्म में स्थित।।५२।।
सेवा हर प्राणी की कर के,
प्रभु सेवा का लाभ उठाते।
कालान्तर में ऐसे प्राणी,
ब्रह्म ज्ञान को अर्जित करते।।५३।।
तेजोमय इस आत्म तत्त्व का,
तप, ध्यान और सत्यनिष्ठ से।
जो भी चिन्तन करते रहते,
विकार रहित हो उच्चचित्ति से।।५४।।
निष्ठा हो जब सत्य के प्रति,
सत्य पथ का द्वार खुले तब।
प्रगति संत का हो उस पथ पर,
कामना की इच्छा छूटे तब।।५५।।
तेजोमय सर्वोच्च ब्रह्म है,
विचार क्षेत्र से परे रहे वो।
दूर भी है और निकट भी है,
ह्रदय कमल में वास करे वो।।५६।।
नेत्रों से वह दिख न पाए,
वाणी व्यक्त न कर पाए उसको।
इन्द्रियों की पहुँच न उस तक,
आहुति से कोई पाए न उसको।।५७।।
ह्रदय शुद्ध कर स्वविवेक से,
ध्यान में ही वो दर्शन देता।
अवयैक्तिक रूप में ही,
आत्म रूप में प्रस्तुत होता।।५८।।
स्वात्मा सूक्ष्म रूप में प्राणियों ,
के श्वास में मिलती ।
पूर्ण चेतना द्वैत नहीं पर,
प्राणियों का दिल धड़काती।।५९।।
शुभाकांक्षी भाव में भर कर,
पूजै सदैव संत जो सोचे।
पूरी होवे मनोकाम जो,
सत्य ह्रदय निर्मल हो सोचे।।६०।।
जन्म मृत्यु के चक्र के बाहर,
वे होते जो स्वार्थ छोड़ कर।
ब्रह्मज्ञानी संत को पूजे,
हो पूरी इच्छा मुमुक्ष होकर।।६१।।
अपनी इन्द्रियों के लक्ष्य को ही,
पूरी करने वाले सुन लो।
प्रेरित इच्छा पूरी करके,
पुनर्जन्म के चक्र में फँस लो।।६२।।
दिग्दर्शन कर स्वात्म का,
क्षुद्धा सब संतुष्ट हो जावे।
इसी जन्म में मुक्ति को पाकर,
पुनर्जन्म फिर वह न पावे।।६३।।
आत्म तत्त्व का ज्ञान उसे हो,
उत्कट इच्छा जब उसकी हो।
अनुभव पावे सूक्ष्म ज्ञान का,
ह्रदयंगम की लगन जिसे हो।।६४।।
निर्बल व विचारहीन हो,
सही ध्यान जो न करते हों।
नहीं दिखाती आत्मा उनको,
अपना जो भी सत्य रूप हो।।६५।।
जानकार बन स्वात्म के,
ऋषिवर आनन्द पूरित रहते।
शान्त रूप हो वरदानी बन,
वासनाओं से मुक्त हो रहते।।६६।।
गहन ध्यान में स्वप्रवेश कर,
सर्वव्यापी ब्रह्म को जाने।
सभी की आत्मा परमात्म में,
जीवात्मा का रूप दिखावे।।६७।।
वेदान्त के सत्य जानकर,
निश्चयपूर्ण व्यवहार कर।
त्याग, योग को धारण करके,
हे मानव जीवन अमर कर।।६८।।
ऐसे व्यक्ति जब तन को त्यागे,
जन्म मृत्यु का बन्धन तोड़ें।
इस जीवन मेंअमरत्व को पाके,
जीवात्मा परमात्मा हो ले।।६९।।
अलौकिक स्त्रोत में जीव समावे,
मृत्यु चाहे जिस पल आवे।
इन्द्रियाँ अपने कारण में जावें,
आत्मा ब्रह्मानन्द को पावें।।७०।।
होकर नाम रूप से मुक्त,
बुद्धि हो संयुक्त परमात्म से।
जैसे नदियॉं सागर से मिल,
मुक्त हो रहीं रूप नाम से।।७१।।
स्वयं ब्रह्म वो भी हो जावे,
जो भी ब्रह्म रूप को जाने।
सानिध्य में जो भी आवे,
तत्त्व आत्म को समझे जाने।।७२।।
सभी दु:खों से सहज पार हो,
कोई भी बुराई जीत न पावे।
अज्ञानता की बेड़ी तोड़े,
और सहज अमरत्व को पावे।।७३।।
पूर्ण समर्पित ह्रदय शुद्ध कर,
ब्रह्मज्ञान उन तक जा पहुँचे।
ब्रह्म नियम न ह्रदय में धारे,
ह्रदय अशुद्ध हो ज्ञान न पहुँचे।।७४।।
सत्य ब्रह्म का शौनक ऋषि ने,
अंगीरा ऋषि को समझाया।
तेजोमय आत्म की जय हो,
जिसने अंगीरा को जगाया।।७५।।
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